ऑनलाइन बैठक

मेन्‍यू

अगला

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 131

449 26/08/2020

सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आ जाओ और शान्ति से मृत्यु का सामना करो

उस घड़ी जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है, तब एक अकेला आत्मा इस पृथ्वी पर जीवन के विषय में अपने अनुभवऔर सृष्टिकर्ता के अधिकार के विषय में अपने अनुभव का प्रारम्भ करता है जिसे सृष्टिकर्ता ने उसके लिए व्यवस्थित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं है, उस व्यक्ति, अर्थात् उस आत्मा, के लिए यह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान को अर्जित करने के लिए, और उसके अधिकार को जानने और व्यक्तिगत तौर पर इसका अनुभव करने के लिए सबसे उत्तम अवसर है। लोग नियति के नियमों के अधीन अपने जीवन को जीते हैं जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उनके लिए व्यवस्थित किया गया है, और किसी भी न्यायसंगत व्यक्ति के लिए जिसके पास विवेक है, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करना और पृथ्वी पर मनुष्यों के कई दशकों के जीवनक्रम के ऊपर उसके अधिकार को पहचानना कोई कठिन कार्य नहीं है कि उसे किया न जा सके। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह पहचानना बहुत ही सरल होना चाहिए, कई दशकों से पुरुष या स्त्री के स्वयं के जीवन के अनुभवों के माध्यम से, कि सभी मनुष्यों की नियति को पूर्वनिर्धारित किया गया है, और इस बात का आभास करना एवं इसे संक्षेप में कहना चाहिए कि जीवित रहने का अर्थ क्या है। ठीक उसी समय जब कोई व्यक्ति जीवन की इन शिक्षाओं को स्वीकार करता है, तब वह धीरे-धीरे यह समझने लगता है कि जीवन कहाँ से आया है, यह आभास करता है कि हृदय को सचमुच में किसकी आवश्यकता है, कौन जीवन के सही मार्ग पर उसकी अगुवाई करेगा, किसी मानव के जीवन का मिशन एवं लक्ष्य क्या होना चाहिए; और वह धीरे-धीरे पहचानने लगेगा कि यदि वह सृष्टिकर्ता की आराधना नहीं करता है, यदि वह उसके प्रभुत्व के अधीन नहीं आता है, तो जब वह मृत्यु का सामना करता है—जब एक आत्मा एक बार फिर से सृष्टिकर्ता का सामना करने वाला है—तब उसका हृदय असीमित भय एवं बेचैनी से भर जाएगा। यदि कोई व्यक्ति इस संसार में कुछ दशकों से अस्तित्व में रहा है और फिर भी नहीं जान पाया है कि मानव जीवन कहाँ से आया है, अभी तक नहीं पहचान पाया है कि किसकी हथेली में मानव की नियति होती है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि वह शान्ति से मृत्यु का सामना करने के योग्य नहीं होगा या नहीं होगी। कोई व्यक्ति जिसने जीवन के कई दशकों का अनुभव करने के बाद सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान को हासिल किया है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के अर्थ एवं मूल्य की सही समझ है; वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के उद्देश्य का गहरा ज्ञान है, और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का सच्चा अनुभव एवं सच्ची समझ है; और उससे भी बढ़कर, वह ऐसा व्यक्ति है जो सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हो सकता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा मानवजाति की सृष्टि के अर्थ को समझता है, यह समझता है कि मनुष्य को सृष्टिकर्ता की आराधना करनी चाहिए, यह कि जो कुछ मनुष्य के पास है वह सृष्टिकर्ता से आता है और वह किसी दिन उसके पास लौटेगा जो भविष्य में ज़्यादा दूर नहीं है; ऐसा व्यक्ति समझता है कि सृष्टिकर्ता मनुष्य के जन्म की व्यवस्था करता है और उसके पास मनुष्य की मृत्यु के ऊपर संप्रभुता है, और यह कि जीवन व मृत्यु दोनों सृष्टिकर्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनिर्धारित हैं। अतः, जब कोई व्यक्ति सचमुच में इन बातों का आभास कर लेता है, तो वह शांति से मृत्यु का सामना करने, अपनी सारी संसारिक सम्पत्तियों को शांतिपूर्वक दूर करने, और बाद में जो कुछ आता है उसको खुशी से स्वीकार करने एवं उसके अधीन होने, और सृष्टिकर्ता द्वारा व्यवस्थित जीवन के अंतिम घटनाक्रम का स्वागत करने योग्य हो जाएगा बजाए इसके कि आँख बंद करके इससे भय खाए और इसके विरुद्ध संघर्ष करे। यदि कोई जीवन को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के लिए एक अवसर के रूप में देखता है और उसके अधिकार को जानने लगता है, यदि कोई अपने जीवन को सृजे गये प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने के लिए और अपने मिशन को पूरा करने के लिए एक दुर्लभ अवसर के रूप में देखता है, तो उसके पास आवश्यक रूप से जीवन के विषय में सही नज़रिया होगा, और सृष्टिकर्ता के द्वारा वह आशीषित जीवन बिताएगा और मार्गदर्शन पाएगा, वह सृष्टिकर्ता के प्रकाश में चलेगा, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानेगा, उसके प्रभुत्व में आएगा, और उसके अद्भुत कार्यों एवं उसके अधिकार का एक गवाह बनेगा। कहने की आवश्यकता नहीं है, ऐसे व्यक्ति को सृष्टिकर्ता के द्वारा प्रेम किया जाएगा एवं स्वीकार किया जाएगा, और केवल ऐसा व्यक्ति ही मृत्यु के प्रति शांत मनोवृत्ति रख सकता है, और जीवन के अंतिम घटनाक्रम का प्रसन्नता से स्वागत कर सकता है। अय्यूब स्पष्ट रूप से मृत्यु के प्रति इस प्रकार की मनोवृत्ति रखता था; वह जीवन के अंतिम घटनाक्रम को प्रसन्नता से स्वीकार करने के लिए ऐसी स्थिति में था, और अपनी जीवन यात्रा को एक सुखदाई निष्कर्ष पर पहुँचाने के बाद, एवं जीवन में अपने मिशन को पूरा करने के बाद, वह सृष्टिकर्ता के पास वापस लौट गया।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

उत्तर यहाँ दें