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परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 51

323 20/07/2020

अय्यूब का असली चेहरा: सच्चा, शुद्ध, और बिना किसी असत्य का

आओ हम निम्नलिखित अंश को पढ़ें: "तब शैतान यहोवा के सामने से निकला, और अय्यूब को पाँव के तलवे से ले सिर की चोटी तक बड़े बड़े फोड़ों से पीड़ित किया। तब अय्यूब खुजलाने के लिये एक ठीकरा लेकर राख पर बैठ गया" (अय्यूब 2:7-8)। यह अय्यूब के आचरण का चित्रण है जब उसके शरीर पर फोड़े निकल आए थे। इस समय, अय्यूब दर्द सहते हुए राख पर बैठ गया। किसी ने भी उससे व्यवहार नहीं की, और किसी ने भी उसके शरीर के दर्द को कम करने के लिए सहायता नहीं की; इसके बजाए, उसने अपने फोड़ों की सतह को खुजाने के लिए एक ठीकरे का इस्तेमाल किया। ऊपरी तौर पर, यह अय्यूब की पीड़ा का एक चरण था, और इसका उसकी मानवता एवं परमेश्वर के भय से कोई नाता नहीं है, क्योंकि अय्यूब ने इस समय अपनी मनःस्थिति एवं विचारों को प्रकट करने के लिए शब्दों का प्रयोग नहीं किया। फिर भी, अय्यूब के कार्य एवं उसका आचरण अभी भी उसकी मानवता की सच्ची अभिव्यक्ति है। पिछले अध्याय के लेख में हमने पढ़ा था कि अय्यूब पूर्व के सभी मनुष्य में सबसे बड़ा था। इसी बीच, दूसरे अध्याय का यह अंश हमें यह दिखाता है कि पूर्व के इस महान व्यक्ति को राख में बैठकर अपने आपको खुजाने के लिए एक ठीकरा लेना पड़ा। क्या इन दोनों चित्रण के बीच स्पष्ट अन्तर नहीं है? यह ऐसा अन्तर है जो हमें अय्यूब के असली व्यक्तित्व को दिखाता है उसकी प्रतिष्ठा एवं हैसियत के बावजूद, उसने कभी उनसे प्रेम नहीं किया या उन पर कोई ध्यान नहीं दिया; उसने परवाह नहीं की कि अन्य लोग उसकी प्रतिष्ठा को कैसे देखते हैं, न ही वह इस विषय में चिंतित था कि उसके कार्य एवं आचरण का उसकी प्रतिष्ठा पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा या नहीं; वह पद प्रतिष्ठा के धन-दौलत में लिप्त नहीं हुआ, न ही उसने उस महिमा का आनन्द उठाया जो हैसियत एवं प्रतिष्ठा से आया था। उसने सिर्फ अपने मूल्यों की और यहोवा परमेश्वर की नज़रों में अपने जीवन को जीने के महत्व की चिंता की थी। अय्यूब का असली व्यक्तित्व ही उसकी हस्ती थी: उसने प्रसिद्धि एवं सौभाग्य से प्रेम नहीं किया था, और वह प्रसिद्धि एवं सौभाग्य के लिए नहीं जीता था; वह सच्चा, शुद्ध और बिना किसी असत्य के था।

अय्यूब के प्रेम एवं नफरत का अलगाव

अय्यूब और उसकी पत्नी के बीच हुए संवाद में उसकी मानवता के एक और पहलु को प्रदर्शित किया गया है: "तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, 'क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।' उसने उससे कहा, 'तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?'" (अय्यूब 2:9-10)। जिस पीड़ा को वह सह रहा था उसे देखते हुए, अय्यूब की पत्नी ने उसे इस पीड़ा से बच निकलने में सहायता करने के लिए सलाह देने की कोशिश की थी—फिर भी उन "भले इरादों" को अय्यूब की मंजूरी प्राप्त नहीं हुई; इसके बजाए, उन्होंने उसके क्रोध को भड़का दिया, क्योंकि उसने यहोवा परमेश्वर में उसके विश्वास एवं उसके प्रति उसकी आज्ञाकारिता का इंकार किया था, और साथ ही यहोवा परमेश्वर के अस्तित्व को भी नकारा था। यह अय्यूब के लिए असहनीय था कि वह दूसरों के विषय में कुछ भी न कहे, क्योंकि उसने स्वयं को ऐसा कुछ करने की अनुमति कभी नहीं दी थी जिससे परमेश्वर का विरोध हुआ हो या उसे तकलीफ पहुंची हो। वह कैसे चुपचाप रह सकता था जब उसने देखा कि अन्य लोगों ने ऐसे शब्दों को कहा जो परमेश्वर की निन्दा एवं उसका अपमान था? इस प्रकार, उसने अपनी पत्नी को "मूर्ख स्त्री" कहा। अपनी पत्नी के प्रति अय्यूब की मानसिकता क्रोध एवं घृणा, साथ ही साथ निन्दा एवं फटकार की थी। यह प्रेम एवं घृणा के बीच अन्तर करने के विषय में अय्यूब के मनुष्यत्व की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी, और यह सच्चे मनुष्यत्व का असली प्रदर्शन था। अय्यूब ने न्याय के एक एहसास को धारण किया था—ऐसा एहसास जिससे उसने दुष्टता की बयार एवं लहर से नफरत की, और बेतुकी झूठी शिक्षा, भद्दे विवादों, एवं ऊटपटांग अभिकथनों से घृणा की, उनकी भर्त्सना एवं उन्हें अस्वीकार किया, और ऐसे एहसास ने उसे अनुमति दी कि वह तब भी अपने सही सिद्धान्तों एवं उद्देश्य को सच्चाई से थामे रहे जब उसे भीड़ के द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था और उसे उन लोगों के द्वारा छोड़ किया गया था जो उसके करीबी थे।

अय्यूब की उदारता एवं ईमानदारी

जबकि, अय्यूब के व्यवहार में हम उसके मनुष्यत्व के विभिन्न पहलुओं की अभिव्यक्ति को देख सकते हैं, तो हम अय्यूब के मनुष्यत्व के किस पहलु को देखते हैं जब उसने अपने जन्म के दिन को कोसने के लिए अपना मुंह खोला था? यह वह विषय है जिस पर हम नीचे बातचीत करेंगे।

ऊपर, मैंने अय्यूब के द्वारा अपने जन्म के दिन को कोसने की शुरुआत के विषय में बात की है। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? यदि अय्यूब कठोर हृदय, और बिना प्रेम के होता, यदि वह ठंडा और भावनारहित होता, एवं मानवता से रहित होता, तो क्या उसने परमेश्वर के हृदय की इच्छा की परवाह की होती? और क्या परमेश्वर के हृदय की परवाह करने के फलस्वरूव वह अपने जन्म के दिन को कोस सकता था? दूसरे शब्दों में, यदि अय्यूब कठोर हृदय का होता और मानवता से रहित होता, तो क्या वह परमेश्वर की पीड़ा से परेशान हो सकता था? क्या वह अपने जन्म के दिन को कोस सकता था क्योंकि परमेश्वर उसके द्वारा व्यथित हुआ था? इसका उत्तर है, बिल्कुल भी नहीं! क्योंकि वह दयालु हृदय का था, इसलिए अय्यूब ने परमेश्वर के हृदय की परवाह की थी; क्योंकि वह परमेश्वर के हृदय की परवाह करता था, इसलिए अय्यूब ने परमेश्वर की पीड़ा का एहसास किया; क्योंकि वह दयालु हृदय का था, इसलिए उसने परमेश्वर की पीड़ा का एहसास करने के परिणामस्वरूप अत्याधिक यातना सही; क्योंकि अय्यूब ने परमेश्वर की पीड़ा का एहसास किया; वह अपने जन्म के दिन से घृणा करने लगा, और इस प्रकार उसने अपने जन्म के दिन को कोसा। बाहरी लोगों के लिए, अय्यूब की परीक्षा के दौरान उसका सम्पूर्ण आचरण एक आदर्श है। केवल उसके द्वारा अपने जन्म के दिन को कोसना ही उसकी खराई एवं सीधाई के ऊपर एक प्रश्न चिन्ह अंकित करता है, या एक एक अलग ही आंकलन प्रदान करता है। वास्तव में, यह अय्यूब की मानवता के मूल-तत्व की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति थी। उसकी मानवता का मूल-तत्व छिपा हुआ या बंद किया हुआ नहीं था, या किसी अन्य के द्वारा संशोधित किया हुआ नहीं था। जब उसने अपने जन्म के दिन को धिक्कारा, तो उसने अपने हृदय की गहराई में उदारता एवं ईमानदारी को प्रदर्शित किया; वह एक ऐसे सोते के समान था जिसका पानी इतना साफ एवं पारदर्शी था कि अपने तल को प्रदर्शित करता था।

अय्यूब के बारे में यह सब कुछ सीखने के बाद, बहुत से लोगों के पास निःसन्देह अय्यूब की मानवता के मूल-तत्व के विषय में निष्पक्ष रूप से एक सटीक एवं वस्तुनिष्ठ (तथ्यों पर आधारित) आंकलन होगा। उनके पास अय्यूब की खराई एवं सीधाई के विषय में एक गहरी, व्यावहारिक, एवं और अधिक उन्नत समझ एवं प्रशंसा भी होनी चाहिए जिसके विषय में परमेश्वर के द्वारा बोला गया था। मुझे आशा है, कि यह समझ एवं प्रशंसा लोगों को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की रीति की शुरुआत करने में सहायता करेगी।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II

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