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परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारण का रहस्य (4)" | अंश 27

657 09/10/2020

अंत के दिनों के कार्य में, वचन चिन्हों एवं अद्भुत कामों के प्रकटीकरण की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिमान है, और वचन का अधिकार चिन्हों एवं अद्भुत कामों से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय में गहराई से दबे सभी भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करता है। तुम अपने बल पर इन्हें पहचानने में असमर्थ हो। जब उन्हें वचन के माध्यम से तुम पर प्रकट किया जाता है, तब तुम्हें स्वाभाविक रुप से ही एहसास हो जाएगा; तुम उन्हें इनकार करने में समर्थ नहीं होगे, और तुम्हें पूरी तरह से यक़ीन हो जाएगा। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह वह परिणाम है जिसे वचन के वर्तमान कार्य के द्वारा प्राप्त किया गया है। इसलिए, बीमारियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने के द्वारा मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकता है और चिन्हों और अद्भुत कामों के प्रदर्शन के द्वारा उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं किया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, परन्तु मनुष्य का देह तब भी शैतान से सम्बन्धित होता है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर बना रहता है। दूसरे शब्दों में, वह जिसे शुद्ध नहीं किया गया है अभी भी पाप और गन्दगी से सम्बन्धित है। जब वचनों के माध्यम से मनुष्य को स्वच्छ कर दिया जाता है केवल उसके पश्चात् ही उसे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह पवित्र बन सकता है। जब मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकाला गया और उसे छुटकारा दिलाया गया, तो इसका अर्थ केवल इतना था कि, मनुष्य को शैतान के हाथ से छीन कर परमेश्वर को लौटा दिया गया है। हालाँकि, उसे परमेश्वर के द्वारा स्वच्छ या परिवर्तित नहीं किया गया है, इसलिए वह भ्रष्ट बना रहता है। मनुष्य के भीतर अब भी गन्दगी, विरोध, और विद्रोशीलता बनी हुई है; मनुष्य केवल छुटकारे के माध्यम से ही परमेश्वर के पास लौटा है, परन्तु मनुष्य को परमेश्वर का जरा सा भी ज्ञान नहीं है और अभी भी परमेश्वर का विरोध करने और उसके साथ विश्वासघात करने में सक्षम है। मनुष्य को छुटकारा दिये जाने से पहले, शैतान के बहुत से ज़हर उसमें पहले से ही गाड़ दिए गए थे। हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किये जाने के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही ऐसा स्वभाव है जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया गया है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, परन्तु भीतर का विषैला स्वभाव नहीं हटाया गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध है उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर अवश्य गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; न्याय और ताड़ना के वचन के द्वारा और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाए, यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्ध करने का कार्य है। सच में, यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है। मनुष्य को वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जाता है; शुद्ध करने, न्याय करने और खुलासा करने के लिए वचन के उपयोग के माध्यम से मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, अवधारणाओं, प्रयोजनों, और व्यक्तिगत आशाओं को पूरी तरह से प्रकट किया जाता है। यद्यपि मनुष्य को छुटकारा दिया गया है और उसके पापों को क्षमा किया गया है, फिर भी इसे केवल इतना ही माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता है और मनुष्य के अपराधों के अनुसार मनुष्य से व्यवहार नहीं करता है। हालाँकि, जब मनुष्य जो देह में रहता है, जिसे पाप से मुक्त नहीं किया गया है, वह भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को अंतहीन रूप से प्रकट करते हुए, केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप और क्षमा का एक अंतहीन चक्र। अधिकांश मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं ताकि शाम को स्वीकार कर सकें। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए सदैव प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से बचाने में समर्थ नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। उदाहरण के लिए, जब लोग जान गए कि वे मोआब के वंशज हैं, तो उन्होंने शिकायत के वचन जारी किए, जीवन की तलाश छोड़ दी, और पूरी तरह नकारात्मक हो गए। क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता है कि मानवजाति अभी भी परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह से समर्पित होने में असमर्थ हैं? क्या यह निश्चित रूप से उनका भ्रष्ट शैतानी स्वभाव नहीं है? जब तुम्हें ताड़ना के अधीन नहीं किया गया था, तो अन्य सभी की तुलना में तुम्हारे हाथ अधिक ऊँचे उठे हुए थे, यहाँ तक कि यीशु के हाथों से भी ऊँचे। और तुम ऊँची आवाज़ में चीख़ रहे थे: "परमेश्वर का प्रिय पुत्र बनो! परमेश्वर का अंतरंग बनो! हम शैतान को समर्पण करने के बजाय मरना चाहेंगे! पुराने शैतान के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़े लाल अजगर के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़ा लाल अजगर पूरी तरह से सत्ता से गिर जाये! परमेश्वर हमें पूरा करें!" अन्य सभी की तुलना में तुम्हारी चीख़े अधिक ऊँची थीं। किन्तु फिर ताड़ना का समय आया और, एक बार फिर, मनुष्यों का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हुआ। फिर, उनकी चीख़ें बंद हो गईं, और उनका संकल्प टूट गया। यही मनुष्य की भ्रष्टता है; यह पाप की अपेक्षा अधिक गहराई तक फैला है, इसे शैतान के द्वारा गाड़ा गया है और यह मनुष्य के भीतर गहराई से जड़ पकड़े हुए है। मनुष्य के लिए अपने पापों के प्रति अवगत होना आसान नहीं है; मनुष्य अपनी स्वयं की गहराई से जमी हुई प्रकृति को पहचानने में असमर्थ है। केवल वचन के न्याय के माध्यम से ही इन प्रभावों को प्राप्त किया जा सकता है। केवल इस प्रकार से ही मनुष्य को उस स्थिति से आगे धीरे-धीरे बदला जा सकता है। मनुष्य अतीत में इस प्रकार चिल्लाता था क्योंकि मनुष्य को अपने मूल भ्रष्ट स्वभाव की कोई समझ नहीं थी। मनुष्य के भीतर इस तरह की अशुद्धियाँ हैं। न्याय और ताड़ना की इतनी लंबी अवधि के दौरान, मनुष्य तनाव के माहौल में रहता था। क्या यह सब वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं किया गया था? क्या सेवा करने वालों की परीक्षा से पहले तुम भी बहुत ऊँची आवाज़ में नहीं चीख़े थे? "राज्य में प्रवेश करो! वे सभी जो इस नाम को स्वीकार करते हैं राज्य में प्रवेश करेंगे! सभी परमेश्वर का हिस्सा बनेंगे!" जब सेवा करने वालों की परीक्षा आयी, तो तुम ने चिल्लाना बंद कर दिया। सबसे पहले, सभी चीख़े थे, "हे परमेश्वर! तुम मुझे जहाँ कहीँ भी रखो, मैं तुम्हारे द्वारा मार्गदर्शन किए जाने के लिए समर्पित होऊँगा।" फिर उसने इन वचनों, "मेरा पौलुस कौन बनेगा?" को देखा और कहा, "मैं तैयार हूँ!" तब उसने इन वचनों, "और अय्यूब की आस्था का क्या?" को देखा। तो उसने कहा, "मैं अय्यूब की आस्था स्वयं पर लेने के लिए तैयार हूँ। परमेश्वर, कृपया मेरी परीक्षा लो!" जब सेवा करने वालों की परीक्षा आयी, तो वह तुरंत ढह गया और फिर न उठ सका। उसके बाद, मनुष्य के हृदय में अशुद्धियाँ धीरे-धीरे घट गईं। क्या यह वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं किया गया था? इसलिए, वर्तमान में जो अनुभव तुम लोगों ने किए हैं, वे वचन के माध्यम से प्राप्त किए गए परिणाम हैं, जो यीशु के चिन्ह दिखाने और अद्भुत काम करने के माध्यम से प्राप्त किए गए अनुभवों से भी बड़े हैं। परमेश्वर की महिमा और परमेश्वर स्वयं का अधिकार जिसे तुम देखते हो वे मात्र सलीब पर चढ़ने, बीमार को चंगा करने और दुष्टात्माओं को बाहर निकालने के माध्यम से नहीं देखे जाते हैं, बल्कि वचन के द्वारा उसके न्याय के माध्यम से और अधिक देखे जाते हैं। यह तुम्हें दर्शाता है कि न केवल चिन्ह दिखाना, बीमारियों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को बाहर निकालना परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य है, बल्कि वचन द्वारा न्याय परमेश्वर के अधिकार का प्रतिनिधित्व करने और उसकी सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करने में बेहतर समर्थ है।

— 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

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