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परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 126

211 13/08/2020

मानव जीवन में छह मोड़ (चुने हुए अंश)

पाँचवाँ मोड़ः संतान

विवाह करने के पश्चात्, व्यक्ति अगली पीढ़ी को बड़ा करना आरंभ करता है। इस पर किसी का वश नहीं चलता कि उसकी कितनी और किस प्रकार की संतानें होंगी; यह भी, व्यक्ति के भाग्य द्वारा निर्धारित होता है जो सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनियत है। यह पाँचवाँ मोड़ है जिससे किसी व्यक्ति को गुज़रना होता है।

यदि किसी का जन्म किसी के बच्चे की भूमिका निभाने के लिए हुआ है, तो वह किसी और के माता-पिता की भूमिका निभाने के लिए अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करता है। भूमिकाओं में होने वाला यह बदलाव व्यक्ति को भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से जीवन की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का अनुभव कराता है। यह व्यक्ति को जीवन के अनुभवों की भिन्न-भिन्न स्थितियों से भी परिचित कराता है, जिनके माध्यम से सृजनकर्ता की संप्रभुता के बारे में उसे पता चलता है, जो हमेशा एक ही तरह से अभिनीत होती है, और जिसके द्वारा उसका इस सच से सामना होता है कि कोई भी सृजनकर्ता की पूर्वनियति का उल्लंघन या उसमें परिवर्तन नहीं कर सकता है।

1. किसी की संतान का क्या होगा इस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता

जन्म, बड़ा होना और विवाह, ये सभी विभिन्न मात्राओं में, विभिन्न प्रकार की निराशा लाते हैं। कुछ लोग अपने परिवारों या अपने शारीरिक रंग-रूप से असंतुष्ट होते हैं; कुछ अपने माता-पिता को नापसंद करते हैं; कुछ लोगों को उस परिवेश से शिकायतें होती हैं जिसमें वे बड़े हुए हैं, या वे उससे अप्रसन्न होते हैं। और अधिकांश लोगों के लिए, इन सभी निराशाओं में विवाह सबसे अधिक असंतोषजनक होता है। कोई व्यक्ति अपने जन्म, परिपक्व होने, या अपने विवाह से चाहे कितना ही असंतुष्ट क्यों न हो, हर एक व्यक्ति जो इनसे होकर गुज़र चुका है, जानता है कि वह यह चुनाव नहीं कर सकता कि उसे कहाँ और कब जन्म लेना है, उसका रूप-रंग कैसा होगा, उसके माता-पिता कौन हैं, और कौन उसका जीवनसाथी है, वरन उसे केवल परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करना होगा। फिर भी जब लोगों द्वारा अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करने का समय आता है, तो वे अपने जीवन के प्रथम हिस्से की समस्त इच्छाओं को जिन्हें वे पूरा करने में असफल रहे थे, अपने वंशजों पर थोप देते हैं। ऐसा वे इस उम्मीद में करते हैं कि उनकी संतान उनके जीवन के प्रथम हिस्से की समस्त निराशाओं की भरपाई कर देगी। इसलिए, लोग अपने बच्चों को लेकर सभी प्रकार की कल्पनाओं में डूबे रहते हैं : उनकी बेटियाँ बड़ी होकर बहुत ही खूबसूरत युवतियाँ बन जाएँगी, उनके बेटे बहुत ही आकर्षक पुरुष बन जाएँगे; उनकी बेटियाँ सुसंस्कृत और प्रतिभाशाली होंगी और उनके बेटे प्रतिभावान छात्र और सुप्रसिद्ध खिलाड़ी होंगे; उनकी बेटियाँ सभ्य, गुणी, और समझदार होंगी, और उनके बेटे बुद्धिमान, सक्षम और संवेदनशील होंगे। वे उम्मीद करते हैं कि उनकी संतान, चाहे बेटे हों या बेटियाँ, अपने बुज़ुर्गों का आदर करेगी, अपने माता-पिता का ध्यान रखेगी, और हर कोई उनसे प्यार और उनकी प्रशंसा करेगा...। इस मोड़ पर जीवन के लिए आशा नए सिरे से अंकुरित होती है, और लोगों के दिल में नई उमंगें पैदा होने लगती हैं। लोग जानते हैं कि वे इस जीवन में शक्तिहीन और आशाहीन हैं, और उनके पास औरों से अलग दिखने का न तो दूसरा अवसर होगा, न फिर ऐसी कोई आशा होगी, और यह भी कि उनके पास अपने भाग्य को स्वीकार करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है। और इसलिए, वे अगली पीढ़ी पर, इस उम्मीद से अपनी समस्त आशाओं, अपनी अतृप्त इच्छाओं, और आदर्शों को थोप देते हैं, कि उनकी संतान उनके सपनों को पूरा करने और उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता कर सकती है; कि उनके बेटे-बेटियाँ परिवार के नाम को गौरवान्वित करेंगे, महत्वपूर्ण, समृद्ध, या प्रसिद्ध बनेंगे। संक्षेप में, वे अपने बच्चों के भाग्य को बहुत ऊँचाई पर देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएँ और कल्पनाएँ उत्तम होती हैं; क्या वे नहीं जानते कि यह तय करना उनका काम नहीं है कि उनके कितने बच्चे हैं, उनके बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएँ कैसी हैं, इत्यादि बच्चों का थोड़ा-सा भी भाग्य उनके हाथ में नहीं है? मनुष्य अपने भाग्य के स्वामी नहीं हैं, फिर भी वे युवा पीढ़ी के भाग्य को बदलने की आशा करते हैं; वे अपने भाग्य से बचकर नहीं निकल सकते, फिर भी वे अपने बेटे-बेटियों के भाग्य को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आप को अपनी क्षमता से बढ़कर नहीं आंक रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है? लोग अपनी संतान के लिए किसी भी हद तक जाते हैं, किन्तु अंत में, किसी व्यक्ति की योजनाएँ और इच्छाएं इसका निर्धारण नहीं कर सकतीं कि उसके कितने बच्चे हों, या उसके बच्चे कैसे हों। कुछ लोग दरिद्र होते हैं परन्तु उनके कई बच्चे होते हैं; कुछ लोग धनी होते हैं फिर भी उनकी एक भी संतान नहीं होती है। कुछ लोग एक बेटी चाहते हैं परन्तु उनकी यह इच्छा पूरी नहीं होती; कुछ लोग एक बेटा चाहते हैं परन्तु एक लड़के को जन्म देने में असफल रहते हैं। कुछ लोगों के लिए, बच्चे एक आशीर्वाद होते हैं; अन्य लोगों के लिए, वे एक श्राप होते हैं। कुछ दंपति बुद्धिमान होते हैं, फिर भी मंदबुद्धि बच्चों को जन्म देते हैं; कुछ माता-पिता मेहनती और ईमानदार होते हैं, फिर भी जिन बच्चों का वे पालन-पोषण करते हैं वे आलसी होते हैं। कुछ माता-पिता दयालु और सच्चे होते हैं परन्तु उनके बच्चे कुटिल और शातिर बन जाते हैं। कुछ माता-पिता दिमाग और शरीर से स्वस्थ होते हैं किन्तु अपाहिज बच्चों को जन्म देते हैं। कुछ माता-पिता साधारण और असफल होते हैं, फिर भी उनके बच्चे महान उपलब्धियाँ प्राप्त करते हैं। कुछ माता-पिता की हैसियत निम्न होती है फिर भी उनके ऐसे बच्चे होते हैं जो श्रेष्ठता हासिल करते हैं। ...

2. आगामी पीढ़ी को बड़ा करने के बाद, लोग भाग्य के बारे में एक नई समझ प्राप्त करते हैं

विवाह करने वाले अधिकांश लोग लगभग तीस वर्ष की आयु में विवाह करते हैं, यह जीवन का ऐसा समय होता है जब एक व्यक्ति के पास मानवीय भाग्य की कोई समझ नहीं होती है। किन्तु जब लोग बच्चों की परवरिश करना आरंभ करते हैं और उनकी संतान बड़ी होने लगती है, वे नई पीढ़ी को पिछली पीढ़ी के जीवन और सभी अनुभवों को दोहराते हुए देखते हैं, और अपने अतीत को उनमें प्रतिबिंबित होते हुए देखकर उन्हें एहसास होता है कि, युवा पीढ़ी जिस मार्ग पर चल रही है, उसे उनके मार्ग के समान ही न तो नियोजित किया जा सकता है और न ही चुना जा सकता है। इस सच का सामना होने पर, उनके पास यह स्वीकार करने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं होता है कि हर एक व्यक्ति का भाग्य पूर्वनियत है; और इसे पूरी तरह से समझे बिना ही वे धीरे-धीरे अपनी इच्छाओं को दरकिनार कर देते हैं, और उनके दिल का जोश डगमगा जाता है और खत्म हो जाता है...। इस समयावधि के दौरान लोग अधिकांशतः जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को पार कर चुके होते हैं और उन्होंने जीवन की एक नई समझ प्राप्त कर ली होती है, एक नया दृष्टिकोण अपना लिया होता है। इस आयु वाला व्यक्ति भविष्य से कितनी अपेक्षा कर सकता है और उम्मीद करने के लिए उनके पास कौन सी संभावनाएँ हैं? ऐसी कौन सी पचास साल की बूढ़ी स्त्री है जो अभी भी एक सुन्दर राजकुमार का सपना देख रही है? ऐसा कौन सा पचास साल का बूढ़ा पुरुष है जो अभी भी अपनी परी की खोज कर रहा है? ऐसी कौन सी अधेड़ उम्र की स्त्री है जो अभी भी एक भद्दी बतख़ से एक हंस में बदलने की आशा कर रही है? क्या अधिकांश बूढ़े पुरुषों में जवान पुरुषों के समान कार्यक्षेत्र में बहुत अधिक पाने की प्रबल प्रेरणा होती है? संक्षेप में, चाहे कोई पुरुष हो या स्त्री, जो कोई भी इस उम्र तक पहुँच चुका है, उसकी विवाह, परिवार, और बच्चों के प्रति अपेक्षाकृत कहीं अधिक तर्कसंगत, व्यावहारिक सोच होने की संभावना होती है। ऐसे व्यक्ति के पास अनिवार्य रूप से कोई विकल्प नहीं बचता, भाग्य को चुनौती देने की कोई इच्छा नहीं बचती है। जहाँ तक मनुष्य के अनुभव की बात है, जैसे ही कोई व्यक्ति इस आयु में पहुँचता है तो उसमें स्वाभाविक रूप से एक दृष्टिकोण विकसित हो जाता है : "व्यक्ति को अपने भाग्य को स्वीकार कर लेना चाहिए; किसी के बच्चों का अपना भाग्य होता है; मनुष्य का भाग्य स्वर्ग द्वारा निर्धारित किया जाता है।" अधिकांश लोग जो सत्य को नहीं समझते हैं, इस संसार के सभी उतार-चढ़ावों, कुंठाओं, और कठिनाइयों को झेलने के बाद, मानव जीवन में अपनी अंतर्दृष्टि को तीन शब्दों में सारांशित करते हैं : "यह भाग्य है!" यद्यपि यह वाक्यांश मनुष्य के भाग्य के बारे में सांसारिक लोगों के निष्कर्ष और समझ को सारगर्भित ढंग से बताता है, और यद्यपि यह मानवजाति के असहाय होने को अभिव्यक्त करता है और इसे तीक्ष्ण और सटीक कहा जा सकता है, फिर भी यह सृजनकर्ता की संप्रभुता को समझने से एकदम अलग है, और सृजनकर्ता के अधिकार के ज्ञान की जगह तो बिलकुल भी नहीं ले सकता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III

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