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परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 43

276 12/07/2020

शैतान एक बार फिर से अय्यूब की परीक्षा लेता है (अय्यूब के सम्पूर्ण शरीर में फोड़े निकल आते हैं)

क. परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन

(अय्यूब 2:3) यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।"

(अय्यूब 2:6) यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।"

ख. शैतान के द्वारा कहे गए वचन

(अय्यूब 2:4-5) शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

ग. अय्यूब इस परीक्षा से कैसे निपटता है

(अय्यूब 2:9-10) तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, "क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।" उसने उससे कहा, "तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया।

(अय्यूब 3:3) वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, "बेटे का गर्भ रहा।"

परमेश्वर के मार्ग के लिए अय्यूब का प्रेम अन्य सभी चीज़ों से बढ़कर है

पवित्र शास्त्र परमेश्वर एवं शैतान के बीच कहे गए वचनों को निम्नलिखित रूप में दर्ज करता है: "यहोवा ने शैतान से पूछा, 'क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है'" (अय्यूब 2:3)। इस संवाद में, परमेश्वर उसी प्रश्न को शैतान के सामने फिर से दोहराता है। यह ऐसा प्रश्न है जो हमें यहोवा परमेश्वर के सकारात्मक आंकलन को दिखाता है कि पहले परीक्षण के दौरान अय्यूब के द्वारा क्या प्रदर्शित किया गया था और कैसा जीवन जीया गया था, और यह ऐसा प्रश्न है जो अय्यूब के विषय में परमेश्वर के आंकलन से अलग नहीं है इससे पहले कि वह शैतान की परीक्षा से होकर गुज़रता। कहने का तात्पर्य है, उसके ऊपर परीक्षा के आने से पहले, परमेश्वर की दृष्टि में अय्यूब सिद्ध था, और इस प्रकार परमेश्वर ने उसकी एवं उसके परिवार की सुरक्षा की थी, और उसे आशीषित किया था; वह परमेश्वर की दृष्टि में आशीषित होने के योग्य था। परीक्षा के पश्चात्, अपनी सम्पत्ति एवं अपने बच्चों को खो देने के कारण अय्यूब ने अपने होंठों से पाप नहीं किया, परन्तु निरन्तर यहोवा के नाम की प्रशंसा करता रहा। उसके वास्तविक आचरण से ही परमेश्वर ने उसकी प्रशंसा की, और उसे पूरा अंक दिया। क्योंकि अय्यूब की दृष्टि में, उसका वंश या उसकी सम्पत्ति परमेश्वर को त्यागने के लिए पर्याप्त नहीं थी। दूसरे शब्दों में, उसके हृदय में परमेश्वर के स्थान को उसकी संतानों या सम्पत्ति के किसी भी भाग के द्वारा नहीं लिया जा सकता था। अय्यूब की प्रथम परीक्षा के दौरान, उसने दिखाया कि परमेश्वर के लिए उसका प्रेम और परमेश्वर का भय मानने एवं बुराई से दूर रहने की रीति के लिए उसका प्यार अन्य सभी चीज़ों से बढ़कर था। यह मात्र ऐसा है कि इस परीक्षण ने अय्यूब को यहोवा परमेश्वर से प्रतिफल पाने का और उसके द्वारा उसकी सम्पत्ति एवं संतानों को उससे दूर करने का अनुभव प्रदान किया।

अय्यूब के लिए, यह एक सच्चा अनुभव था जिसने उसके प्राण (मन) को धोकर स्वच्छ किया था, यह जीवन का एक बपतिस्मा था जिसने उसके अस्तित्व को पूर्ण किया था, और, इससे अधिक क्या, यह एक शानदार दावत थी जिसने परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता एवं उसके भय को परखा था। इस परीक्षा ने अय्यूब की स्थिति को एक धनवान पुरुष से ऐसे मनुष्य में रूपान्तरित कर दिया जिसके पास कुछ भी नहीं था, और साथ ही इसने उसे मानवजाति के विषय में शैतान के शोषण का अनुभव करने की अनुमति भी प्रदान की थी। उसकी दीन-हीन दशा ने उसे शैतान से घृणा करने नहीं दिया; उसके बजाए, उसने शैतान के बहुत ही बुरे कार्यों में शैतान की कुरूपता एवं नीचता को, साथ ही साथ परमेश्वर के प्रति शैतान की शत्रुता एवं विद्रोह को भी देखा था, और इसने उसे हमेशा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को दृढ़ता से थामे रहने के लिए अच्छी तरह प्रेरित किया। उसने शपथ खाई थी कि वह बाहरी कारकों जैसे सम्पत्ति, बच्चे या सगे-सम्बन्धियों के कारण कभी परमेश्वर को नहीं त्यागेगा और परमेश्वर के मार्ग से कभी पीछे नहीं हटेगा, न ही वह कभी शैतान, सम्पत्ति, या किसी व्यक्ति का दास बनेगा; यहोवा परमेश्वर को छोड़, कोई उसका प्रभु या उसका परमेश्वर नहीं हो सकता था। अय्यूब की आकांक्षाएं ऐसी ही थीं। परीक्षा की दूसरी ओर, अय्यूब ने भी कुछ अर्जित किया थाः उसने परमेश्वर के द्वारा दिए गए परीक्षण के मध्य अपार धन-सम्पत्ति अर्जित की थी।

पिछले कई दशकों से अपने जीवन काल के दौरान, अय्यूब ने यहोवा के कार्यों को देखा था और अपने लिए यहोवा परमेश्वर की आशीषों को हासिल किया था। वे ऐसी आशीषें थीं जिन्होंने उसे अत्यंत व्याकुलता एवं ऋणी होने का एहसास कराया था, क्योंकि वह विश्वास करता था कि उसने परमेश्वर के लिए कुछ भी नहीं किया, फिर भी उसे इतनी बड़ी आशीषें मीरास में प्राप्त हुईं और उसने भरपूर अनुग्रह का आनन्द उठाया था। इस कारण से, वह अपने हृदय में प्रायः प्रार्थना किया करता था, यह आशा करते हुए कि वह परमेश्वर को बदले में कुछ देने के योग्य होगा, यह आशा करते हुए कि उसके पास परमेश्वर के कार्यों एवं महानता की गवाही देने के लिए अवसर होगा, और यह आशा करते हुए कि परमेश्वर उसकी आज्ञाकारिता को परखेगा, और, इससे बढ़कर, उसके विश्वास को शुद्ध किया जा सकता था, जब तक उसकी आज्ञाकारिता एवं उसका विश्वास परमेश्वर की स्वीकृति को हासिल न कर ले। और जब वह परीक्षण अय्यूब के ऊपर आया, तो उसने विश्वास किया कि परमेश्वर ने उसकी प्रार्थनाओं को सुन लिया था। अय्यूब ने किसी अन्य चीज़ से बढ़कर इस अवसर को अपने हृदय में संजोया, और इस प्रकार उसने इससे आसानी से निपटने की हिमाकत नहीं की, क्योंकि उसके जीवनकाल की सबसे बड़ी इच्छा साकार हो सकती थी। इस अवसर के आगमन का अर्थ था कि उसकी आज्ञाकारिता एवं परमेश्वर के भय को परखा जा सकता था, और शुद्ध किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त, इसका अर्थ था कि अय्यूब के पास परमेश्वर की स्वीकृति को हासिल करने का एक मौका था, इस प्रकार, इसने इसे परमेश्वर के और करीब पहुंचाया। परीक्षण के दौरान, ऐसे विश्वास एवं अनुसरण ने उसे और अधिक सिद्ध बनाने, और परमेश्वर की इच्छा की और अधिक समझ हासिल करने की अनुमति प्रदान की। अय्यूब परमेश्वर की आशीषों एवं अनुग्रह के लिए और अधिक आभारी हो गया, उसने अपने हृदय में परमेश्वर के कार्यों के लिए और अधिक प्रशंसा को उंडेला, और वह परमेश्वर के विषय में और अधिक भयातुर एवं श्रद्धालु हो गया, और उसने परमेश्वर की सुन्दरता, महानता एवं पवित्रता की और अधिक अभिलाषा की। इस समय, हालाँकि परमेश्वर की दृष्टि में अय्यूब अभी भी ऐसा पुरुष था जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, फिर भी उसके अनुभवों के लिहाज से, अय्यूब का विश्वास एवं ज्ञान बहुत जल्दी बढ़ गया: उसका विश्वास बढ़ चुका था, उसकी आज्ञाकारिता को पाँव रखने की जगह मिल गई थी, और परमेश्वर के विषय में उसका भय और अधिक गम्भीर हो चुका था। हालाँकि इस परीक्षण ने अय्यूब की आत्मा एवं जीवन को रूपान्तरित किया, फिर भी ऐसे रूपान्तरण ने अय्यूब को संतुष्ट नहीं किया, न ही इसने आगे की ओर उसकी प्रगति को धीमा किया। ठीक उसी समय यह गुणा भाग करते हुए कि उसने इस परीक्षण से क्या अर्जित किया था, और अपनी स्वयं की कमियों पर विचार करते हुए उसने खामोशी से प्रार्थना की, और अगले परिक्षण का इंतजार किया कि वह उसके ऊपर आए, क्योंकि उसने अपने विश्वास, आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के भय को परमेश्वर के अगले परीक्षण के दौरान उन्नत किए जाने लालसा की थी।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II

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