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परमेश्वर के दैनिक वचन : देहधारण | अंश 101

631 09/01/2021

कार्य आरंभ करने से पहले, यीशु सामान्य मानवता में रहता था। कोई नहीं कह सकता था कि वह परमेश्वर है, किसी को भी पता नहीं चला कि वह देहधारी परमेश्वर है; लोग उसे पूरी तरह से एक साधारण व्यक्ति ही समझते थे। उसकी सर्वथा सामान्य, साधारण मानवता इस बात का प्रमाण थी कि परमेश्वर ने देहधारण किया है, और अनुग्रह का युग देहधारी परमेश्वर के कार्य का युग है, न कि पवित्रात्मा के कार्य का युग। यह इस बात का प्रमाण था कि परमेश्वर का आत्मा पूरी तरह से देह में साकार हुआ है और परमेश्वर के देहधारण के युग में उसका देह पवित्रात्मा का समस्त कार्य करेगा। सामान्य मानवता वाला मसीह ऐसा देह है जिसमें आत्मा साकार हुआ है, जिसमें सामान्य मानवता है, सामान्य बोध है और मानवीय विचार हैं। "साकार होने" का अर्थ है परमेश्वर का मानव बनना, आत्मा का देह बनना; इसे और स्पष्ट रूप से कहें, तो यह तब होता है जब स्वयं परमेश्वर सामान्य मानवता वाले देह में वास करके उसके माध्यम से अपने दिव्य कार्य को व्यक्त करता है—यही साकार होने या देहधारी होने का अर्थ है। अपने पहले देहधारण के दौरान, परमेश्वर के लिए बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना आवश्यक था, क्योंकि उसका कार्य छुटकारा दिलाना था। पूरी मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए, उसका दयालु और क्षमाशील होना आवश्यक था। सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले उसने बीमार को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने का कार्य किया, जो उसके द्वारा मनुष्य के पाप और मलिनता से उद्धार के पूर्वलक्षण थे। चूँकि वह अनुग्रह का युग था, इसलिए बीमारों को चंगा करके संकेत और चमत्कार दिखाना परमेश्वर के लिए आवश्यक था, जो उस युग में अनुग्रह के प्रतिनिधि थे—क्योंकि अनुग्रह का युग अनुग्रह प्रदान करने के आस-पास केन्द्रित था, जिसका प्रतीक शान्ति, आनंद और भौतिक आशीष थे, जो कि सभी यीशु में लोगों के विश्वास की निशानियाँ थीं। अर्थात् बीमार को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, और अनुग्रह प्रदान करना, अनुग्रह के युग में यीशु के देह की सहज क्षमताएँ थीं, ये देह में साकार हुए पवित्रात्मा के कार्य थे। किन्तु जब वह ऐसे कार्य कर रहा था, तब वह देह में रह रहा था, देह से परे नहीं गया था। उसने चंगाई का चाहे कैसा भी कार्य क्यों न किया हो, तब भी उसमें सामान्य मानवता ही थी, तब भी वह एक सामान्य मानव जीवन ही जी रहा था। परमेश्वर के देहधारण के युग में देह ने पवित्रात्मा के सभी कार्य किए, मेरा ऐसा कहने का कारण यह है कि चाहे उसने कोई भी कार्य किया हो, उसने वह कार्य देह में रहकर ही किया था। किन्तु उसके कार्य की वजह से, लोगों ने उसके देह को पूरी तरह से दैहिक सार धारण करने वाला नहीं माना, क्योंकि वह देह चमत्कार कर सकता था, और किसी विशेष समय में ऐसे कार्य कर सकता था जो देह से परे के होते थे। बेशक, ये सारी घटनाएँ उसकी सेवकाई आरंभ करने के बाद हुईं, जैसे कि चालीस दिनों तक उसकी परीक्षा लिया जाना या पहाड़ पर रूपान्तरित होना। तो यीशु के साथ, परमेश्वर के देहधारण का अर्थ पूर्ण नहीं हुआ था, बल्कि केवल आंशिक तौर पर पूर्ण हुआ था। अपना कार्य आरंभ करने से पहले उसने देह में जो जीवन जिया वह हर तरह से एकदम सामान्य था। कार्य आरंभ करने के बाद, उसने केवल अपने देह के बाहरी आवरण को बनाए रखा। क्योंकि उसका कार्य दिव्यता की अभिव्यक्ति था, इसलिए यह देह के सामान्य कार्यों से बढ़कर था। आख़िरकार, परमेश्वर का देहधारी देह मांस-और-रक्त वाले मानव से भिन्न था। बेशक, अपने दैनिक जीवन में, उसे भोजन, कपड़ों, नींद और आश्रय की आवश्यकता पड़ती थी, उसे सभी आम ज़रूरत की चीज़ों की आवश्यकता होती थी, उसमें सामान्य मानवीय बोध था, और वह एक आम इंसान की तरह ही सोचता था। उसके अलौकिक कार्य को छोड़कर, लोग अभी भी उसे एक सामान्य मनुष्य ही मान रहे थे। वास्तव में, प्रत्येक कार्य करते हुए वह एक साधारण और सामान्य मानवता में ही जी रहा था और जहाँ तक उसने जो कार्य किया, उसकी बात है, उसकी समझ विशेष रूप से सामान्य थी, उसके विचार, किसी भी अन्य सामान्य मनुष्य की अपेक्षा, विशेष रूप से अधिक सुस्पष्ट थे। इस प्रकार की सोच और समझ एक देहधारी परमेश्वर के लिए आवश्यक थी, क्योंकि दिव्य कार्य को ऐसे देह के द्वारा व्यक्त किए जाने की आवश्यकता थी जिसकी समझ बहुत ही सामान्य हो और विचार बहुत ही सुस्पष्ट हों—केवल इसी प्रकार से उसका देह दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकता था। यीशु ने इस पृथ्वी पर अपने पूरे साढ़े तैतीस साल के वास में, अपनी सामान्य मानवता बनाए रखी, किन्तु उसकी इन साढ़े तैतीस साल की सेवकाई के दौरान, लोगों ने सोचा कि वह सर्वश्रेष्ठ है, पहले की अपेक्षा बहुत ही अलौकिक है। जबकि असलियत में, यीशु की सामान्य मानवता सेवकाई आरंभ करने से पहले और बाद में अपरिवर्तित रही; पूरे समय उसकी मानवता एक-सी थी, किन्तु जब उसने अपनी सेवकाई आरंभ की उससे पहले और उसके बाद के अंतर के कारण, उसके देह को लेकर, दो भिन्न-भिन्न मत उभरे। लोगों की राय कुछ भी रही हो, लेकिन देहधारी परमेश्वर ने पूरी अवधि में, अपनी सामान्य मानवता बनाए रखी, क्योंकि जबसे परमेश्वर देहधारी हुआ था, तब से वह देह में ही रहा, ऐसे देह में जिसमें सामान्य मानवता थी। चाहे वह अपनी सेवकाई कर रहा हो या न कर रहा हो, उसके देह की सामान्य मानवता को मिटाया नहीं जा सकता था, क्योंकि मानवता देह का मूल सार है। अपनी सेवकाई से पहले, सभी सामान्य मानवीय क्रियाकलापों में संलग्न रहते हुए यीशु का देह पूरी तरह से सामान्य रहा; वह जरा-सा भी अलौकिक नज़र नहीं आया, उसने कोई भी चमत्कारी संकेत नहीं दिखाए। उस समय, वह केवल एक आम इंसान था जो परमेश्वर की आराधना करता था, भले ही उसका लक्ष्य अधिक ईमानदार था, किसी भी व्यक्ति से अधिक निष्ठापूर्ण था। इस प्रकार उसकी सर्वथा सामान्य मानवता ने स्वयं को अभिव्यक्त किया। चूँकि सेवकाई का कार्य शुरू करने से पहले, उसने कोई कार्य नहीं किया था, इसलिए कोई उसे पहचानता नहीं था, कोई नहीं कह सकता था कि उसका देह बाकी लोगों से अलग है, क्योंकि उसने एक भी चमत्कार नहीं किया था, स्वयं परमेश्वर का ज़रा-सा भी कार्य नहीं किया था। लेकिन, सेवकाई का कार्य प्रारंभ करने के बाद, उसने सामान्य मानवता का बाहरी आवरण बनाए रखा और तब भी सामान्य मानवीय सूझबूझ के साथ ही जीता रहा, लेकिन क्योंकि उसने स्वयं परमेश्वर का कार्य करना, मसीह की सेवकाई अपनाना और उन कार्यों को करना आरंभ कर दिया था जिन्हें करने में नश्वर प्राणी, मांस-और-रक्त से बने प्राणी अक्षम थे, इसलिए लोगों ने मान लिया कि उसकी सामान्य मानवता नहीं है, उसका देह पूरी तरह से सामान्य नहीं है बल्कि अपूर्ण देह है। उसके द्वारा किए गए कार्य की वजह से, लोगों ने कहा कि वह देह में परमेश्वर है जिसके पास सामान्य मानवता नहीं है। ऐसी समझ गलत है, क्योंकि लोगों ने देहधारी परमेश्वर की महत्ता को नहीं समझा। यह गलतफहमी इस तथ्य से पैदा हुई थी कि परमेश्वर द्वारा देह में व्यक्त कार्य दिव्य कार्य है, जो ऐसे देह में व्यक्त किया जाता है जिसकी एक सामान्य मानवता है। परमेश्वर देह के आवरण में था, उसका वास देह में था, परमेश्वर की मानवता में उसके कार्य ने उसकी मानवता की सामान्यता को धुँधला कर दिया था। इसी कारण से लोगों ने विश्वास कर लिया कि परमेश्वर में मानवता नहीं है केवल दिव्यता है।

— वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य

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