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परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप | अंश 258

1,526 04/08/2020

जिस क्षण से तुम रोते हुए इस दुनिया में आते हो, तभी से तुम अपना कर्तव्य पूरा करना शुरू कर देते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान में अपनी भूमिका निभाते हुए तुम अपनी जीवन-यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जैसी भी हो, कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बचकर भाग नहीं सकता, और किसी का भी अपनी नियति पर नियंत्रण नहीं है, क्योंकि केवल वही, जो सभी चीज़ों पर शासन करता है, ऐसा कार्य करने में सक्षम है। जिस दिन से मनुष्य अस्तित्व में आया है, परमेश्वर ने ब्रह्मांड का प्रबंधन करते हुए, सभी चीज़ों के लिए परिवर्तन के नियमों और उनकी गतिविधियों के पथ को निर्देशित करते हुए हमेशा ऐसे ही काम किया है। सभी चीज़ों की तरह मनुष्य भी चुपचाप और अनजाने में परमेश्वर से मिठास और बारिश और ओस द्वारा पोषित होता है; सभी चीज़ों की तरह मनुष्य भी अनजाने में परमेश्वर के हाथ के आयोजन के अधीन रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर के हाथ में हैं, उसके जीवन की हर चीज़ परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह मानो या न मानो, कोई भी और सभी चीज़ें, चाहे जीवित हों या मृत, परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही जगह बदलेंगी, परिवर्तित, नवीनीकृत और गायब होंगी। परमेश्वर सभी चीज़ों को इसी तरीके से संचालित करता है।

जब रात चुपचाप आती है, मनुष्य अनजान रहता है, क्योंकि मनुष्य का हृदय यह नहीं समझ सकता कि रात कैसे आती है या कहाँ से आती है। जब रात चुपचाप चली जाती है, मनुष्य दिन के उजाले का स्वागत करता है, लेकिन उजाला कहाँ से आया है और कैसे इसने रात के अँधेरे को दूर भगाया है, मनुष्य यह तो बिलकुल भी नहीं जानता और इससे तो बिलकुल भी अवगत नहीं है। दिन और रात की यह बारंबार होने वाली अदला-बदली मनुष्य को एक अवधि से दूसरी अवधि में, एक ऐतिहासिक संदर्भ से अगले संदर्भ में ले जाती है, और यह भी सुनिश्चित करती है कि हर अवधि में परमेश्वर का कार्य और हर युग के लिए उसकी योजना कार्यान्वित की जाए। मनुष्य इन विभिन्न अवधियों में परमेश्वर के साथ चला है, फिर भी वह नहीं जानता कि परमेश्वर सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों की नियति पर शासन करता है, न ही यह जानता है कि कैसे परमेश्वर सभी चीज़ों को आयोजित और निर्देशित करता है। इसने मनुष्य को अनादि काल से आज तक भ्रम में रखा है। जहाँ तक कारण का सवाल है, ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर के तरीके बहुत छिपे हुए हैं, न इसलिए कि परमेश्वर की योजना अभी तक साकार नहीं हुई है, बल्कि इसलिए है कि मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर से बहुत दूर हैं, उतनी दूर, जहाँ मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करते हुए भी शैतान की सेवा में बना रहता है—और उसे इसका भान भी नहीं होता। कोई भी सक्रिय रूप से परमेश्वर के पदचिह्नों और उस प्रकटन को नहीं खोजता और कोई भी परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहने के लिए तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे इस दुनिया के और दुष्ट मानवजाति द्वारा अनुसरण किए जाने वाले अस्तित्व के नियमों के अनुकूल होने के लिए, उस दुष्ट शैतान द्वारा किए जाने वाले क्षरण पर भरोसा करना चाहते हैं। इस बिंदु पर, मनुष्य का हृदय और आत्मा शैतान के लिए आभार व्यक्त करते उपहार और उसका भोजन बन गए हैं। इससे भी अधिक, मानव हृदय और आत्मा एक ऐसा स्थान बन गए हैं, जिसमें शैतान निवास कर सकता है, और वे शैतान के खेल का उपयुक्त मैदान बन गए हैं। इस तरह, मनुष्य अनजाने में मानव होने के सिद्धांतों और मानव-अस्तित्व के मूल्य और अर्थ के बारे में अपनी समझ को खो देता है। परमेश्वर की व्यवस्थाएँ और परमेश्वर और मनुष्य के बीच की वाचा धीरे-धीरे मनुष्य के हृदय में धुँधली होती जाती है, और वह परमेश्वर की तलाश करना या उस पर ध्यान देना बंद कर देता है। समय बीतने के साथ मनुष्य अब यह नहीं समझता कि परमेश्वर ने उसे क्यों बनाया है, न ही वह उन वचनों को जो परमेश्वर के मुख से आते हैं और न उस सबको समझता है, जो परमेश्वर से आता है। मनुष्य फिर परमेश्वर की व्यवस्थाओं और आदेशों का विरोध करने लगता है, और उसका हृदय और आत्मा शिथिल हो जाते हैं...। परमेश्वर उस मनुष्य को खो देता है, जिसे उसने मूल रूप से बनाया था, और मनुष्य अपनी शुरुआत का मूल खो देता है : यही इस मानव-जाति की त्रासदी है। वास्तव में, बिल्कुल शुरुआत से अब तक, परमेश्वर ने मनुष्य-जाति के लिए एक त्रासदी का मंचन किया है, ऐसी त्रासदी, जिसमें मनुष्य नायक और पीड़ित दोनों है। और कोई इसका उत्तर नहीं दे सकता कि इस त्रासदी का निर्देशक कौन हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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