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मानवजाति द्वारा परमेश्वर के मार्गदर्शन को खो देने के परिणाम

539 04/08/2020

मानवजाति द्वारा सामाजिक विज्ञानों के आविष्कार के बाद से
मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान से भर गया है।
तब से विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए हैं,
और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए
पर्याप्त गुंजाइश और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं रही हैं।
मनुष्य के हृदय में परमेश्वर की स्थिति सबसे नीचे हो गई है।
हृदय में परमेश्वर के बिना मनुष्य की आंतरिक दुनिया अंधकारमय,
आशारहित और खोखली है।
बाद में मनुष्य के हृदय और मन को भरने के लिए कई समाज-वैज्ञानिकों,
इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने सामने आकर सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत,
मानव-विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांत व्यक्त किए,
जो इस सच्चाई का खंडन करते हैं कि
परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है,

और इस तरह, यह विश्वास करने वाले बहुत कम रह गए हैं
कि परमेश्वर ने सब-कुछ बनाया है,
और विकास के सिद्धांत पर विश्वास करने वालों की संख्या
और अधिक बढ़ गई है।
अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों
और उसके वचनों को मिथक और किंवदंतियाँ समझते हैं।
अपने हृदयों में लोग परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति,
उदासीन हो जाते हैं।
और इस सिद्धांत के प्रति भी कि परमेश्वर का अस्तित्व है
और वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है, उदासीन हो जाते हैं।
मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य
उनके लिए अब और महत्वपूर्ण नहीं रहे,
और मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलासिता की खोज में चिंतित,
एक खोखले संसार में रहता है। ...
कुछ लोग स्वयं इस बात की खोज करने का उत्तरदायित्व लेते हैं
कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है,
या यह तलाशने का उत्तरदायित्व कि वह किस प्रकार
मनुष्य के गंतव्य पर नियंत्रण और उसकी व्यवस्था करता है।

मनुष्य के बिना जाने ही मानव-सभ्यता
मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार चलने में और भी अधिक अक्षम हो गई है,
और कई ऐसे लोग भी हैं, जो यह महसूस करते हैं कि इस प्रकार के संसार में रहकर वे,
उन लोगों के बजाय जो चले गए हैं, कम खुश हैं।
यहाँ तक कि उन देशों के लोग भी, जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे,
इस तरह की शिकायतें व्यक्त करते हैं।
क्योंकि परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना
शासक और समाजशास्त्री मानवजाति की सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए
अपना कितना भी दिमाग क्यों न ख़पा लें,
कोई फायदा नहीं होगा।
मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई नहीं भर सकता,
मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई नहीं भर सकता,
क्योंकि कोई मनुष्य का जीवन नहीं बन सकता,
और कोई सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को
उस खालीपन से मुक्ति नहीं दिला सकता, जिससे वह व्यथित है।

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