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परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 111 परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 111
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परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 111

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परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को जानने के लिए एक मनुष्य को अनुभव और कल्पना पर भरोसा नहीं करना चाहिए

जब तुम स्वयं को परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का सामना करते हुए पाते हो, तो क्या तुम कहोगे कि परमेश्वर के वचन में मिलावट है? क्या तुम कहोगेकि परमेश्वर के क्रोध के पीछे एक कहानी है, और यह कि उसके क्रोध में मिलावट है? क्या तुम परमेश्वर पर कलंक लगाओगे, यह कहते हुए कि उसका स्वभाव आवश्यक रूप से पूर्णत: धर्मी नहीं है? परमेश्वर के प्रत्येक कार्य के साथ व्यवहार करते समय, तुम्हें पहले निश्चित होना होगा कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव अन्य तत्वों से मुक्त है; कि यह पवित्र और त्रुटिहीन है; इन कार्यों में परमेश्वर द्वारा मनवता को मारकर नीचे गिराना, दण्ड देना और नष्ट करना शामिल है। बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर के हर एक कार्य को उसके अंतर्निहित स्वभाव और उसकी योजना के अनुसार सख्ती से बनाया गया है—इस में मानवता का ज्ञान, परम्परा और दर्शनशास्त्र शामिल नहीं है—परमेश्वर का हर एक कार्य उसके स्वभाव और हस्ती का एक प्रकटीकरण है, और किसी भी ऐसी चीज़ से असम्बद्धित है जो भ्रष्ट मानवता से सम्बन्धित है। मनुष्य की अवधारणाओं में, मानवता के प्रति केवल परमेश्वर का प्रेम, करुणा और सहनशीलता ही दोषरहित, अमिश्रित और पवित्र है। फिर भी, कोई नहीं जानता है कि परमेश्वर का कोप और उसका क्रोध इसी तरह अमिश्रित हैं; इसके अतिरिक्त, किसी के पास भी वैचारिक प्रश्न नहीं हैं जैसे परमेश्वर किसी गुनाह को क्यों नहीं सहता है या उसका कोप इतना भयंकर क्यों है? इसके विपरीत, कुछ लोग परमेश्वर के क्रोध को भ्रष्ट मानवता का मिजाज़ जान कर ग़लती करते हैं; वे परमेश्वर के क्रोध को भ्रष्ट मानवता का कोप समझते हैं; यहाँ तक कि वे भूलवश अनुमान लगते हैं कि परमेश्वर का कोप मानवता के भ्रष्ट स्वभाव के स्वाभाविक प्रकाशन के समान ही है। वे भूलवश विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के क्रोध का जारी होना भ्रष्ट मानवता के क्रोध के समान ही है; जो नाराज़गी से उत्पन्न होता है; वे यहाँ तक विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के क्रोध का जारी होना उसके मिजाज़ का एक प्रदर्शन है। इस सहभागिता के पश्चात्, मैं आशा करता हूँ कि यहाँ उपस्थित तुम लोगों में से हर एक के पास आगे से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को लेकर किसी भी प्रकार की ग़लत अवधारणा, कल्पना या अनुमान नहीं रहेगा, और मैं आशा करता हूँ कि मेरे वचनों को सुनने के पश्चात् तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के क्रोध की सही पहचान हो सकती है, कि तुम लोग परमेश्वर के क्रोध के विषय में पिछले समय की किसी भी ग़लत समझ को अलग कर सकते हैं, कि तुम लोग अपने ग़लत विश्वास और परमेश्वर के क्रोध के आवश्यक तत्वों के प्रति दृष्टिकोण को बदल सकते हो। इससे बढ़कर, मैं आशा करता हूँ कि तुम सब अपने हृदयों में परमेश्वर के स्वभाव की एक सटीक परिभाषा पा सकते हो, कि तुम लोगों के पास आगे से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को लेकर कोई सन्देह नहीं होगा, कि तुम लोग परमेश्वर के सच्चे स्वभाव के ऊपर कोई मानवीय तर्क या अनुमान नहीं थोपोगे। परमेश्वर का धर्मी स्वभाव परमेश्वर की स्वयं की सच्ची हस्ती है। यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य के द्वारा कुशलता से आकार दिया गया है या लिखा गया है। उसका धर्मी स्वभाव उसका अपना धर्मी स्वभाव है और इसका सृष्टि की किसी भी चीज़ के साथ कोई सम्बन्ध या नाता नहीं है। परमेश्वर स्वयं ही स्वयं परमेश्वर है। वह कभी भी सृष्टि का एक भाग नहीं बन सकता है, और भले ही वह सृजे गए प्राणियों के बीच एक सदस्य बन जाए, फिर भी उसका अंतर्निहित स्वभाव और हस्ती नहीं बदलेगी। इसलिए, परमेश्वर को जानना किसी पदार्थ को जानना नहीं है; यह किसी चीज़ की चीर-फाड़ करना नहीं है, न ही यह किसी व्यक्ति को समझना है। यदि तुम किसी पदार्थ को जानने हेतु अपनी धारणा या पद्धति का इस्तेमाल करते हो या परमेश्वर को जानने के लिए किसी व्यक्ति को समझते हो, तो तुम परमेश्वर के ज्ञान को हासिल करने में कभी भी सक्षम नहीं होंगे। परमेश्वर को जानना अनुभव या कल्पना पर भरोसा करना नहीं है, और इसलिए तुम्हें अपने अनुभव या कल्पना को परमेश्वर पर नहीं थोपना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम्हारे अनुभव और कल्पना कितने समृद्ध हो सकते हैं, क्योंकि वे अभी भी सीमित हैं; इससे अधिक क्या है, तुम्हारी कल्पना तथ्यों से मेल नहीं खाती है, और सच्चाई से तो बिलकुल भी मेल नहीं खाती है, और यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और उसकी हस्ती से असंगत है। यदि तुम परमेश्वर की हस्ती को समझने के लिए अपनी कल्पना पर भरोसा करते हो तो तुम कभी भी सफल नहीं होगे। एकमात्र रास्ता इस प्रकार है: वह सब ग्रहण कीजिए जो परमेश्वर से आता है, फिर धीरे-धीरे उसका अनुभव कीजिए और समझिए। एक ऐसा दिन होगा जब परमेश्वर तुम्हारे सहयोग के कारण और सत्य के लिए तुम्हारी भूख और प्यास के कारण तुम्हें ज्योतिर्मय करेगा ताकि तुम सचमुच में उसे समझो और जानो।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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