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मेन्‍यू

परमेश्वर की सहायता के लिए एक प्रार्थना: परीक्षा से पहले होनेवाली चिंता से मैंने खुद को छुटकारा दे दिया।

2012 की मेरी सीनियर हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षाएँ मेरे जीवन का पहला मोड़ थीं। मेरे पूरे परिवार ने मुझसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की, और मुझे पूरा भरोसा था कि मैं अपनी परीक्षा पास करूँगा और सीनियर हाई स्कूल में पहुँचूँगा। एक लाख वर्षों में मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अपनी परीक्षा में असफल हो जाऊंगा। लेकिन मैंने किया, और मुझे बहुत बुरा लगा, और मैं न तो खा सकता था और न ही सो सकता था। मैंने अपने आप को अपने कमरे में बंद कर दिया और मैं किसी को नहीं देखना चाहता। काफ़ी लंबे समय तक, मैं अपनी असफल परीक्षाओं की निराशा में पड़ा रहा। हर दिन मुझे इस तरह के दर्द में देखकर, मेरी माँ ने मेरे सामने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा: "मैं मनुष्य के मन के विचारों और मनुष्य के हृदय की इच्छाओं से भली-भांति परिचित हूँ: कौन है जिसने ख़ुद के लिए कभी बचने का तरीका नहीं खोजा? कौन है जिसने कभी अपने लिए संभावनाओं के बारे में नहीं सोचा? फिर भी भले ही मनुष्य एक समृद्ध और चकित करने वाली मेधा से संपन्न हो, पर कौन इस भविष्यवाणी में समर्थ था कि युगों के बाद, वर्तमान जैसा हो गया है वैसा होगा? क्या यह वास्तव में तुम्हारे व्यक्तिनिष्ठ प्रयासों का परिणाम है? क्या यही तुम्हारे अथक परिश्रम का प्रतिदान है? क्या यह तुम्हारे मन में परिकल्पित सुंदर झाँकी है? यदि मैंने संपूर्ण मनुष्यजाति का मार्गदर्शन नहीं किया होता, तो कौन स्वयं को मेरी व्यवस्थाओं से अलग करने और कोई अन्य तरीका ढूँढने में समर्थ हो पाता? क्या मनुष्यों की यही कल्पनाएँ और इच्छाएँ उसे आज यहाँ तक लेकर आई हैं? बहुत से लोगों का संपूर्ण जीवन उनकी इच्छाएं पूरी हुए बिना ही बीत जाता है। क्या यह वास्तव में उनकी सोच में किसी दोष की वजह से होता है? बहुत से लोगों का जीवन अप्रत्याशित खुशी और संतुष्टि से भरा होता है। क्या यह वास्तव में इसलिए है क्योंकि वे बहुत कम अपेक्षा रखते हैं? संपूर्ण मानवजाति में कौन है जिसकी सर्वशक्तिमान की नज़रों में देखभाल नहीं की जाती? कौन सर्वशक्तिमान द्वारा तय प्रारब्ध के बीच नहीं रहता? क्या मनुष्य का जीवन और मृत्यु उसका अपना चुनाव है? क्या मनुष्य अपने भाग्य को खुद नियंत्रित करता है?" ("संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन" के 'अध्याय 11')। परमेश्वर के शब्दों से, मुझे पता चला कि हमारे भाग्य का शासन और व्यवस्था परमेश्वर के हाथों में है। हमारे पूरे जीवन में जो निराशाएँ, नाकामयाबीया और असफलताएँ अनुभव होती हैं, उनका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है—यह सब परमेश्वर के हाथों में है। उदाहरण के लिए, मेरी परीक्षा लें। मुझे विश्वास था कि कि मैं अपनी परीक्षा पास करूँगा और अपने आदर्श सीनियर हाई स्कूल में पहुँच जाऊंगा, लेकिन मैंने सोचा भी नहीं था उस तरह से में परीक्षा में असफल रहा। बाहर से, यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना की तरह लग रहा था, लेकिन परमेश्वर सभी चीजों के शासक हैं, और इसलिए इसके पीछे परमेश्वर की अच्छी मर्जी रहीं होंगी। परमेश्वर के शब्दों के मार्गदर्शन में, मैंने धीरे-धीरे अपने आप को समर्पित कर दिया, और मैंने अपना दर्द पीछे छोड़ दिया। मेरे आश्चर्य के लिए, बस जब मैं परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं की ओर समर्पित होने के लिए तैयार हो गया और अपने भविष्य और अपने भाग्य को परमेश्वर को सौंप दिया, तो मुझे अप्रत्याशित रूप से स्वास्थ्य विद्यालय में स्वीकार किया गया। जब यह समाचार आया, तो मेरा पूरा परिवार खुश हो गया, और मुझे यह याद आया कि परमेश्वर मेरे साथ ही था, कि वह जरूरत के समय मददगार था, और मैंने बहुत दिल से परमेश्वर को धन्यवाद दिया।

एक पलक झपकते ही, स्वास्थ्य विद्यालय में पाँच साल का अध्ययन समाप्त हो गया, और मुझे अपने जीवन के दूसरे मोड़ पर सामना करना पड़ा—एक नर्स के रूप में योग्यता प्राप्त करने की परीक्षा। एक नर्स के रूप में योग्यता प्राप्त करना मेरे लिए अविश्वसनीय रूप से महत्वपूर्ण था, क्योंकि मैंने नर्सिंग का अध्ययन किया था। इस योग्यता के बिना, न केवल मैं नर्सिंग में अपना करियर नहीं बना पाऊंगा, बल्कि पांच साल के कठिन अध्ययन काभी कुछ महत्त्व नहीं रहेगा। खासतौर पर जब मैंने सोचा कि मेरे पिताजी ने मेरी ट्यूशन के लिए भुगतान करने के लिए हर दिन सुबह से लेकर शाम तक कड़ी मेहनत की है, अगर मैं नर्स के रूप में योग्य नहीं हो पाती, तो मुझे ऐसा लगेगा कि मैंने वास्तव में उन्हें निराश कर दिया है। मेरे भविष्य की संभावनाओं के लिए, मेरे स्वयं के स्वाभिमान के लिए, साथ ही साथ मेरे माता-पिता मेरे लिए जो दर्द में जी रहे थें उसे दूर करने के लिए, मैं इस परीक्षा को आसानी से पास करने और अपने नर्स का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए उत्सुक था। इसलिए मैंने काफी दबाव महसूस हुआ। इसके अलावा, यह परीक्षा जितनी करीब आती गई, मुझे उतना ही चिंताजनक महसूस होने लगा, और मैं हर दिन यह अनुमान लगाता था कि मेरी परीक्षा का परिणाम क्या होगा: अगर मैंने आराम से परीक्षा उत्तीर्ण कर ली, तो मैं अपनी सफ़ेद नर्स के पहनावे में बहुत स्मार्ट लगूंगा! लेकिन अगर मैं असफल हो गया तो मैं क्या करूंगा? मेरा परिवार और मेरे करीबी दोस्त मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मैं इस प्रमाण पत्र के बिना भविष्य में समाज में अपना स्थान कैसे पाऊंगा?

मैं इतना चिंतित महसूस करता

परीक्षा से पहले, मैं इतना चिंतित महसूस करता था कि मैं दबाव के कारण शायद ही साँस ले पाता था। मैंने अविश्वसनीय रूप से व्यथित महसूस किया और इसलिए मैंने अपनी माँ से उसके बारे में उसके साथ संगति करने की माँग की। मेरी माँ ने मुझसे कहा, "ज़ियाओहुआन, मैं समझ सकती हूँ कि तुम अपने भविष्य और अपनी संभावनाओं को लेकर चिंतित और व्याकुल हो। लेकिन हमारी सारी चिंता पूरी तरह से अनावश्यक है क्योंकि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में शासित है। अगर हम वास्तव में इस सच्चाई को समझ सकते हैं, कि परमेश्वर मानव जाति के भाग्य का संचालन करता है, तो हमें इतना दर्द महसूस नहीं होगा। चलो परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ें, ठीक है?" उसने फिर मेरे सामने पढ़ा: "संसार के सृजन के समय से मैंने लोगों के इस समूह को—अर्थात् आज के तुम लोगों को—पूर्वनिर्धारित करना तथा चुनना प्रारंभ कर दिया है। तुम लोगों का मिज़ाज, क्षमता, रूप-रंग, कद-काठी, वह परिवार जिसमें तुमने जन्म लिया, तुम्हारी नौकरी और तुम्हारा विवाह—अपनी समग्रता में तुम, यहां तक कि तुम्हारे बालों और त्वचा का रंग, और तुम्हारे जन्म का समय—सभी कुछ मेरे हाथों से तय किया गया था। यहां तक कि हर एक दिन जो चीज़ें तुम करते हो और जिन लोगों से तुम मिलते हो, उसकी व्यवस्था भी मैंने अपने हाथों से की थी, साथ ही आज तुम्हें अपनी उपस्थिति में लाना भी वस्तुत: मेरा ही आयोजन है। अपने आप को अव्यवस्था में न डालो; तुम्हें शांतिपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए" ("आरंभ में मसीह के कथन" के 'अध्याय 74')। मेरी माँ ने तब मेरे साथ बातचीत की: "परमेश्वर ने सृष्टि की सर्जना की है और हमारी भी सर्जना की गई हैं। हर एक व्यक्ति का भाग्य, जिसमें हमारा जन्म, हमारा रूप, हमारा कैलिबर, भविष्य में हमारे पास कौन सी नौकरी होगी, इत्यादि शामिल हैं, सभी पर परमेश्वर का शासन है, और परमेश्वर ने पहले से ही हमारे लिए यह सब तय कर रखा है। अब हम परमेश्वर में विश्वास करते हैं और हम उनके शब्दों के भीतर से परमेश्वर की संप्रभुता को जानते हैं, और इसलिए हमें सीखना चाहिए कि कैसे हम सभी खुद को परमेश्वर को सौंपें और उसे देखें, और कैसे परमेश्वर के व्यवस्था और आयोजन के लिए खुद को समर्पित करें। हमें बस इतना करना होगा कि कड़ी मेहनत से पढ़ाई करे और नर्स की परीक्षा के परिणाम को परमेश्वर के हाथों में सौंप दें। हमें यह सीखना चाहिए कि प्रकृति को कैसे आगे बढ़ने देना है, क्योंकि तब हम इतने दबाव में महसूस नहीं करेंगे और एक परीक्षा के साथ हम बहुत चिंतित महसूस नहीं करेंगे।" परमेश्वर के शब्दों और मेरी माँ की बातचीत को सुनने के बाद, मैंने सोचा: "यह सही है। मेरी चिंता अनावश्यक है। मेरी किस्मत परमेश्वर के हाथों में है, और परमेश्वर ने बहुत पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि मैं इस परीक्षा को पास कर पाऊंगा या नहीं और भविष्य में मेरे पास कौन सी नौकरी होगी। मैं सिर्फ एक सृजित प्राणी हूं, और मुझे सृष्टि के परमेश्वर की आयोजन और व्यवस्था के लिए समर्पित होना चाहिए।" मेरी माँ ने उसके बाद मेरे साथ बहुत बातचीत की, और आखिरकार मुझे समझ में आया कि इस परीक्षा के परिणाम से मेरी भविष्य की संभावनाएँ नहीं बनने वाली थीं। लेकिन वे उन व्यवस्थाओं से उपजे थे जो सृष्टि के परमेश्वर ने मेरे जीवन के लिए बनाई थीं। मैंने अपने स्कूल के साथियों के बारे में सोचा, जिनके पास भी इस तरह का अनुभव था। हालांकि कुछ के पास उच्च स्तर की शिक्षा थी, लेकिन स्नातक होने के बाद उन्हें जो नौकरियां मिलीं, वे उतनी अच्छी नहीं थीं। हालाँकि, कुछ लोग बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं, और उनके स्कूल के रिकॉर्ड भी उतने अच्छे नहीं थें, और फिर भी उनके पास कुछ विशेष कौशल हैं और इसलिए वे अच्छी नौकरी पाई हैं और खुशहाल जीवन जी रहे हैं। इन बातों को समझने के बाद, मेरा दिल अच्छा महसूस करने लगा, और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! मुझे जल्द ही एक नर्स के रूप में योग्यता प्राप्त करने के लिए परीक्षा का सामना करना पड़ेगा, और मुझे नहीं पता कि मैं इसे पास करूंगा या नहीं। कृपया मेरे दिल की रक्षा करें, ताकि भले ही मैं असफल होऊं, मैं आपको दोष ना दू। मैं आपकी संप्रभुता के लिए समर्पित होना चाहता हूं।"

लेकिन जैसे-जैसे परीक्षा दिन-ब-दिन नजदीक आ रही थी, मुझे अभी भी चिंता होने लगी थी, और इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उनको अपनी सारी कठिनाइयों और उन सभी बातों के बारे में बताया जो मेरे दिल में थीं। बाद में, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "मेरे भीतर शांत रहो, क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ, तुम लोगों का एकमात्र उद्धारक। तुम लोगों को हर समय अपने हृदय शांत रखने चाहिए और मेरे भीतर रहना चाहिए; मैं तुम्हारी चट्टान हूँ, तुम्हारा पुश्ता। कोई दूसरा विचार मत करो, बल्कि अपने पूरे दिल से मुझ पर भरोसा करो और मैं निश्चित रूप से तुम्हारे सामने प्रकट हूँगा—मैं तुम लोगों का परमेश्वर हूँ!" ("आरंभ में मसीह के कथन" के 'अध्याय 26')। "अब यह बहुत सरल है : मुझे अपने दिल से देखो, तुम्हारी आत्मा तुरंत मजबूत हो जाएगी। तुम्हारे पास अभ्यास करने का मार्ग होगा और मैं हर कदम पर तुम्हारा मार्गदर्शन करूंगा। मेरा वचन हर समय और हर स्थान पर तुम्हारे लिए प्रकट किया जाएगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कहाँ या कब, या वातावरण कितना प्रतिकूल है, मैं तुम्हें स्पष्टता से दिखाऊंगा और मेरा दिल तुम्हारे लिए प्रकट किया जाएगा, यदि तुम मेरी ओर अपने दिल से देखते हो; इस तरह, तुम रास्ते में आगे निकल जाओगे और कभी अपने रास्ते से नहीं भटकोगे" ("आरंभ में मसीह के कथन" के 'अध्याय 13')। "हाँ, वास्तव में!" मैंने सोचा। "ऐसा कुछ नहीं है जो परमेश्वर नहीं कर सकता, और सब कुछ परमेश्वर के हाथों में प्रशासित है। जब परमेश्वर मेरी सहायता करने के लिए है तो फिर डरने का क्या मतलब है?" मैंने सोचा कि मैंने आमतौर पर केवल यह कैसे कहा कि मैं परमेश्वर और उनकी संप्रभुता में विश्वास करता था, और फिर भी मुझे परमेश्वर के वचनों का कोई व्यावहारिक अनुभव नहीं था। इस वजह से, जब भी मुझे कोई मुश्किल का सामना करना पड़ा, मैं चिंतित और व्याकुल महसूस करने लगा, और मैंने देखा कि परमेश्वर में मेरा विश्वास काफ़ी काम था! यह देखकर कि मैं परमेश्वर में विश्वास रखता हूं, मुझे यह सीखना चाहिए कि कैसे परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए और सभी चीजों में परमेश्वर को देखना चाहिए—यह महत्वपूर्ण था, और यह सबसे बड़ा ज्ञान था। इन बातों को समझने के बाद, मैंने हर दिन परमेश्वर की आज्ञाकारिता की प्रार्थना की और मेरा दिल शांत होता गया।

बहुत जल्द, नर्स की परीक्षा का दिन आ गया। जब मेरे पिता और मैं उस सुबह घर छोड़ने वाले थे, मेरी माँ ने मुझे चाहे जो कुछ भी हो परमेश्वर से प्रार्थना करने के लिए, परमेश्वर पर भरोसा करने के लिए और परमेश्वर को न भूलने के लिए कहा। परीक्षा के रास्ते में, जब मुझे चिंता होने लगी, तो मैंने जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना की और परमेश्वर से कहा: "परमेश्वर! मुझे नहीं पता कि आज क्या होगा, और मुझे नहीं पता कि परीक्षा कठिन होगी या नहीं, या इसमें ऐसी चीजें शामिल होंगी जिनकी मैंने समीक्षा की है या नहीं। हे परमेश्वर! मैं आप पर भरोसा करना चाहता हूं और आपके आयोजन और व्यवस्था में समर्पित होना चाहता हूं।" जैसे ही हम परीक्षा केंद्र पहुंचने वाले थे, मेरे पिताजी अचानक मेरे पास आए और कहा, "कितना अजीब है! ट्रैफिक लाइट हमारे लिए रास्ते में हर जगह हरी ही थीं।" मैंने महसूस किया कि यह मार्गदर्शन और व्यवस्था परमेश्वर की थी। परमेश्वर मुझसे एक मूक भाषा में बात कर रहे थे, मुझे बता रहे थे कि मैं अकेले इस परीक्षा का सामना नहीं कर रहा था, कि वह हमेशा मेरी मदद करने के लिए थे, मुझे मार्गदर्शन दे रहे थे, और मुझे विश्वास और साहसपूर्वक इस परीक्षा को परमेश्वर के हाथों में सौंप देना चाहिए।

जैसे ही मैंने परीक्षा केंद्र में प्रवेश किया, मुझे बहुत शांति महसूस हुई, क्योंकि मैं जानता था कि परीक्षा पास करने या न करने पर परमेश्वर का अंतिम कहना होगा। मुझे केवल इतना करना था कि मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करूं और परीक्षा के परिणाम को परमेश्वर के हाथों में सौंप दूं। जब मैंने चिंतित महसूस किया, तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, उस पर भरोसा किया, और परमेश्वर से मुझे शांत करने के लिए कहा। जब में परीक्षा शुरू होने का इंतजार कर रहा था, मैंने परमेश्वर को याद किया, और जितना अधिक मैंने प्रार्थना की, उतना ही मुझे आराम और शांति महसूस हुई। परीक्षा के दौरान, जब भी कोई ऐसा प्रश्न आता था, जिसका मैं जवाब देने में सक्षम नहीं था, तो मैं परमेश्वर को याद करता था और उनसे अपने दिल की रक्षा करने के लिए बोलता था। पूरी परीक्षा के दौरान, परमेश्वर ने मेरी रक्षा की और मेरे दिल को शांत किया, ताकि मैं सवालों के उत्तर अच्छे से सोच सकूं, और मैंने बिल्कुल भी चिंतित महसूस नहीं किया। परीक्षा समाप्त होने के बाद, मेरे सहपाठियों ने कहा कि प्रश्न कितने कठिन थे, जबकि मुझे नहीं लगा कि वे उतने कठिन थे। मुझे पता था कि यह सब परमेश्वर के मार्गदर्शन के कारण था।

बाद में, जैसा कि मैंने परीक्षा के परिणाम जारी होने का इंतजार किया, तब भी मैं अक्सर चिंतित और असहज महसूस करता था। हर बार ऐसा होने पर, मैं अपने हृदय में परमेश्वर से प्रार्थना करता था, और मुझे हर समय यह याद रहता था कि मैंने परीक्षा में अच्छा किया है या नहीं, वह सब परमेश्वर के ज्ञान द्वारा व्यवस्थापित किया गया था। जब भी मैंने यह सोचा, मेरी नसें शांत हो गईं। एक फ्लैश में, दो महीने बीत गए और परीक्षा परिणाम ऑनलाइन प्रकाशित होने वाले थे। इससे पहले कि मैं अपने परिणामों की जाँच करूँ, मैंने परमेश्वर से आज्ञाकारिता की प्रार्थना की और कहा, परिणाम चाहे जो भी हो, मैंने प्रार्थना की कि परमेश्वर मुझे मार्गदर्शन देंगे कि मुझे कैसे समर्पित होना है।

परमेश्वर की सहायता के लिए एक प्रार्थना

जब मेरे परिणामों की जांच करने का समय आया, तो मैंने साहस एकत्रित कर के परिणाम की जांचा। मेरे दो स्कोर 351 और 331 थे, जो कि पासिंग स्कोर लाइन की तुलना में क्रमशः 51 और 31 अंक अधिक है! मैं परमेश्वर का बहुत आभारी था! मैं पास हो गया था! मुझे अपना नर्स का प्रमाणपत्र मिल सकता है! उस पल में, मैं खुशी से अभिभूत महसूस किया! मैंने परमेश्वर को धन्यवाद कहा। मुझे पता था कि इसमें से कुछ भी मेरे द्वारा हासिल नहीं किया गया था, लेकिन परमेश्वर के मार्गदर्शन, अनुग्रह और आशीर्वाद के कारण हुआ था!

इस व्यक्तिगत अनुभव की वजह से मैंने वास्तव में सराहना की कि, जब मैंने ईमानदारी से परमेश्वर पर भरोसा किया और परमेश्वर की ओर देखा, परमेश्वर ठीक वहीं मेरे बगल में थे, मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे और मेरी अगुवाई कर रहे थे और मेरे लिए एक रास्ता खोल रहे थे। उसी समय, मुझे यह भी समझ में आ गया कि, यदि हम परीक्षा से पहले होनेवाली चिंता से खुद को मुक्त करना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले अपने लक्ष्यों को बहुत ऊंचा नहीं करना चाहिए, हमारे पास एक दिल होना चाहिए, और हमें परमेश्वर ने हमारे भाग्य के लिए जो भी व्यवस्था की है उसे समर्पित होना चाहिए; दूसरी बात, हमें परमेश्वर से ईमानदारी से प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर के वचनों को अपने साथ रखना चाहिए, और तब हम शांति और आराम महसूस करेंगे, और हम शांति से किसी का भी सामना कर पाएंगे।

परमेश्वर ने मुझे पूर्व-परीक्षा की चिंता से छुटकारा पाने और अच्छे स्कोर के साथ अपनी परीक्षा पास करने में मदद की। परमेश्वर का धन्यवाद।

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