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परमेश्वर की गवाही | "जख़्म" | हिंदी ईसाई फिल्म

245,023 14/09/2020

ली चेन्शी बचपन से ही अपने माता-पिता के साथ सभाओं में भाग लेकर बाइबल को पढ़ती रही है। 1988 में, जब वह सिर्फ 13 वर्ष की थी, एक सभा में भाग लेते समय उसे गिरफ़्तार कर लिया जाता है, फिर एक छोटी-सी अँधेरी कोठरी में एक दिन दो रात के लिए तालाबंद कर दिया जाता है। तब से, सीसीपी कभी भी उसका उत्पीड़न करना नहीं छोड़ती। 17 वर्ष की उम्र में, कलीसिया के दूसरे भाई-बहनों को परमेश्वर के वचनों की क़िताबें भेजने के कारण पुलिस उसे एक बार फिर गिरफ़्तार कर लेती है। क़िताबों का स्रोत बताने के लिए उससे ज़ोर-ज़बरदस्ती करने की कोशिश में पुलिस उसके सामने ही उसके पिता की क्रूरता से पिटाई करती है, और उस पर "राजनीतिक बंदी" का लेबल लगाकर गलियों में घुमाती है। 1996 में, पुलिस ली चेन्शी को फिर एक बार गिरफ़्तार करने आती है। उसके पास अपने कस्बे से भागने और एक भगोड़े की ज़िंदगी बिताने के सिवाय कोई विकल्प नहीं रहता। सीसीपी पुलिस के बार-बार के इस उत्पीड़न और डराने-धमकाने की वजह से उसके पूरे परिवार को निरंतर आतंक के माहौल में जीना पड़ता है। लंबी अवधि के तनाव और भय को बरदाश्त न कर सकने के कारण उसकी माँ का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और पहले से ही सेहत की तकलीफ़ों से जूझ रहे उसके पिता की हालत, पुलिस द्वारा क्रूर पिटाई की वजह से और बिगड़ जाती है। इस तरह से हमेशा खुश रहने वाला एक परिवार टूट कर बिखर जाता है। छिपकर भागते रहने के दौरान, ली चेन्शी देश-भर में सुसमाचार को फैलाने के काम में भाई-बहनों के साथ हो जाती है। सीसीपी के आतंक के इस राज में, वे सब बहुत कष्ट झेलते हैं, बार-बार उनका दमन और गिरफ़्तारी होती है। कुछ भाई-बहनों को गिरफ़्तार कर उन्हें बर्बरता से यातना दी जाती है। कुछ को पीट-पीट कर मार डाला जाता है, और कुछ को 10 साल से भी ज्यादा की जेल की सज़ा दे दी जाती है। 2012 के आख़िरी दिनों में, सुसमाचार को साझा करते समय ली चेन्शी को फिर से गिरफ़्तार कर लिया जाता है, चार महीने के लंबे समय तक उससे पूछताछ करने, अपराध कबूल करवाने और मत-परिवर्तन करने की पुरज़ोर कोशिशें होती हैं।

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