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तीन बार शैतान के प्रलोभनों पर विजय पाने से मुझे परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए बड़ा विश्वास मिला

ऑड्रे ऐशमोर, फिलिपींस

प्रिय मित्रों, क्या अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने के बाद आपने एक के बाद एक मुश्किलों का सामना किया? शायद आपके परिवार में परेशानी आई हो या शायद किसी स्वास्थ्य की समस्या की वजह से आप—जो पहले परमेश्वर के प्रेम में डूबे हुए थे—इस हद तक नकारात्मक और अस्वीकृत महसूस करने लगे कि आपने परमेश्वर को गलत समझा और उसे दोषी ठहराया। वास्तव में, मैंने स्वयं इसका अनुभव किया है। यदि सच्चे मार्ग की जाँच करते हुए आप भी कुछ कठिनाइयों में पड़े हों, तो मैं आपको बताना चाहती हूँ कि ये चीजें जो आप अनुभव कर रहे हैं, उनके पीछे वास्तव में परमेश्वर की भली मंशा है, और परमेश्वर इन कठिनाइयों का उपयोग हमें बढ़ने देने के लिए कर रहा है। मेरे अनुभवों पर एक नज़र डालें।

मैं बैपटिस्ट चर्च में एक सहकर्मी हुआ करती थी। जुलाई 2018 में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य की जांच-पड़ताल शुरू की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गयी कि परमेश्वर, अंत के दिनों में न्याय और शुद्धिकरण का कार्य करने के लिए कई लाखों वचनों को व्यक्त कर रहा था, ताकि हम शैतान द्वारा अपने भ्रष्टाचार के सत्य को पहचान सकें और हमारा भ्रष्टाचार धीरे-धीरे साफ़ हो जाए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन अधिकार और सामर्थ्य से ओत-प्रोत हैं, उन्होंने मुझे न केवल अपनी स्वयं की अपर्याप्तता, कमियों और विद्रोह को देखने में सक्षम किया है, बल्कि मैं परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता को भी पहचान पाई हूँ। इसके बाद, मैं निश्चित हो गयी कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है, और वह लौटा हुआ प्रभु यीशु है। प्रभु की वापसी का स्वागत करने पर, मेरे दिल को ऐसी शांति और खुशी महसूस हुई जिसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों को ध्यान से पढ़ा और सक्रिय रूप से कलीसियाई जीवन जीने लगी। हालांकि, मुझे पता नहीं था कि एक महीने बाद, मैं एक के बाद एक बीमारियों से ग्रस्त होती चली जाऊँगी...

एक ईसाई बीमार है

बीमारी का प्रहार

मेरा स्वास्थ्य हमेशा से अच्छा रहा है लेकिन एक दिन, मुझे अचानक फ्लू हो गया। बीमारी के लक्षणों में बुखार, खांसी, सिरदर्द, सांस लेने में कठिनाई और पूरे शरीर में दर्द था। मुझे इतने गम्भीर ढंग से फ्लू पहले कभी नहीं हुआ था। ये बीमारी बस अचानक ही हो गयी। इस बात से चिंतित कि मेरी बीमारी बढ़ती जाएगी, मैंने लक्षणों को कम करने के लिए दवा लेनी शुरू कर दी। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना भी की और उससे मुझे ठीक करने के लिए याचना की। लेकिन न केवल मेरी हालत बेहतर नहीं हुई बल्कि इसके विपरीत ये और बदतर हो गयी। एक शाम, मैं नियमित रूप से सांस नहीं ले पा रही थी और पूरी रात सो भी ना सकी थी। मैं सोचे बिना न रह सकी: "सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकारने के बाद मैं अचानक बीमार कैसे हो गयी? परमेश्वर मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहा है? यदि मेरी स्थिति और बिगड़ती गयी तो मैं क्या करुँगी?" जितना अधिक मैं इसके बारे में सोचती, उतना ही अधिक मैं निराश महसूस करती थी। मैं अब अपने भाई-बहनों के साथ सभाओं में नहीं जाना चाहती थी, मैं बस आराम करना चाहती थी।

अगले दिन, जिन बहनों के साथ मैं सभाओं में जाया करती थी, उनमें से एक ने संदेश भेजकर मेरी तबियत के बारे में पूछा। मैंने उसे अपनी बीमारी के बारे में बताया, फिर उसने मेरे लिए परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा: "परमेश्वर अपना कार्य करता है, वह एक व्यक्ति की देखभाल करता है, उस पर नज़र रखता है, और शैतान इस पूरे समय के दौरान उसके हर कदम का पीछा करता है। परमेश्वर जिस किसी पर भी अनुग्रह करता है, शैतान भी पीछे-पीछे चलते हुए उस पर नज़र रखता है। यदि परमेश्वर इस व्यक्ति को चाहता है, तो शैतान परमेश्वर को रोकने के लिए अपने सामर्थ्य में सब-कुछ करता है, वह परमेश्वर के कार्य को भ्रमित, बाधित और नष्ट करने के लिए विभिन्न बुरे हथकंडों का इस्तेमाल करता है, ताकि वह अपना छिपा हुआ उद्देश्य हासिल कर सके। क्या है वह उद्देश्य? वह नहीं चाहता कि परमेश्वर किसी भी मनुष्य को प्राप्त कर सके; उसे वे सभी लोग अपने लिए चाहिए जिन्हें परमेश्वर चाहता है, ताकि वह उन पर कब्ज़ा कर सके, उन पर नियंत्रण कर सके, उनको अपने अधिकार में ले सके, ताकि वे उसकी आराधना करें, ताकि वे बुरे कार्य करने में उसका साथ दें। क्या यह शैतान का भयानक उद्देश्य नहीं है?"

उसके बाद उसने यह कहते हुए संगति दी, "परमेश्वर के वचन हमें बताते हैं कि, जब परमेश्वर हमें बचाने के लिए अपना कार्य करता है, तो शैतान हमें परेशान करने और सताने के लिए कुछ काम करता है। हमें परमेश्वर का अनुसरण करने से रोकने के लिए वो जो बन पड़े वो करता है। शैतान ऐसा इसलिए करता है क्योंकि वह नहीं चाहता कि हम परमेश्वर पर विश्वास करें या उसकी आराधना करें, इसके बजाय वह चाहता है कि हम उसकी आराधना करें, उसके प्रति निष्ठा का प्रण लें। एक बार जब हम परमेश्वर के कदमों के साथ तालमेल बिठा लेते हैं, तो यह दर्शाता है कि हम शैतान के अंधकारमय प्रभाव से बचना चाहते हैं, अब उसके बने रहना नहीं चाहते हैं, हम अब उसके भ्रष्टाचार और नियंत्रण के अधीन रहना नहीं चाहते। लेकिन शैतान इतनी आसानी से हमें नहीं छोड़ता। इसलिए हमें परेशान करने के लिए वह सब कुछ करता है जो वो कर सकता है, वह कई कठिनाइयों—यहाँ तक कि आपदाओं को भी—हम पर भेजता है, ताकि परमेश्वर और हमारे बीच कलह के बीज बो सके, हमें परमेश्वर को उस हद तक गलत समझने पर मजबूर कर सके जहाँ हम परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर बैठें, जिससे अंत में वो हमें चुराकर निगल सके। तो वास्तव में, आप पर अचानक आ पड़ी बीमारी के पीछे शैतान है जो आपको सताने की कोशिश कर रहा है। हमें शैतान के पापी इरादे को अच्छी तरह से समझने, अधिक प्रार्थना करने और परमेश्वर पर अधिक भरोसा करने में सक्षम होना चाहिए। हमें परमेश्वर में विश्वास भी रखना चाहिए, क्योंकि हमारी बीमारियाँ ठीक होंगी या नहीं, ये उसके हाथों में है। भले ही हम पर जो पड़ा है वह शैतान का उत्पीड़न है, यह परमेश्वर की अनुमति के बिना है, लेकिन शैतान हमें नुकसान नहीं पहुँचा सकता है। हमें बस परमेश्वर पर ज्यादा भरोसा करना है और अपनी गवाही में दृढ़ रहना है।"

मुझे बहन की संगति से समझ में आ गया कि यह बीमारी जो मुझ पर अचानक पड़ी है, वह शैतान का उत्पीड़न है। शैतान परमेश्वर के साथ मेरे संबंध को बाधित करने, मुझसे अपनी बीमारी के लिए परमेश्वर को दोष दिलवाने के लिए ऐसा कर रहा था। वह मुझे परमेश्वर के वचनों को न पढ़ने, सभाओं में भाग न लेने पर मजबूर करना चाहता था। ऐसा करने से, मैं अंत में परमेश्वर से अलग हो जाऊँगी—शैतान कितना कपटी है! मुझे विवेकपूर्ण होना ही चाहिए, मैं शैतान की चालाक योजना में फंसने का जोखिम नहीं ले सकती। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! शैतान अब मुझे परेशान करने के लिए इस बीमारी का इस्तेमाल कर रहा है। तू मेरे दिल को मजबूत कर और मुझे उसके उत्पीड़न से बचने में सक्षम बना। हे परमेश्वर, मुझे विश्वास कि तू सभी चीजों पर प्रभुता रखता है, और इसलिए मेरा जीवन भी तेरे हाथों में है। मैं तुझसे निवेदन करती हूँ कि तू मेरी रक्षा कर और मुझ पर नज़र रख।" प्रार्थना करने के बाद, मुझे बहुत शांति और सुकून महसूस हुआ और मुझे अब इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि मेरी बीमारी कैसे बढ़ेगी। मैंने बाद में कुछ दवाइयाँ लीं, और मेरे शरीर में उतना दर्द महसूस नहीं हुआ जितना पहले था। इसके बाद के दिनों में, मैंने वह सब किया जिससे मैं परमेश्वर के करीब आ सकूँ। मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, भजन सुने, और मेरी हालत धीरे-धीरे सुधरने लगी। एक हफ्ते बाद, मैं पूरी तरह से बेहतर हो गयी, और मैं एक बार फिर से अपने भाई-बहनों के साथ नियमित रूप से सभाओं में भाग लेने में सक्षम हो गयी।

इस स्थिति का अनुभव करने के माध्यम से, मैंने देखा कि मुझमें परमेश्वर के प्रति विश्वास बहुत कम है। बस, एक छोटी सी प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करने पर मैंने परमेश्वर पर संदेह करना शुरू कर दिया था और सभाओं में जाना नहीं चाहती थी। अगर यह बीमारी मुझे नहीं होती, तो मैं अपना असली कद नहीं देख पाती, शैतान की चालाक योजनाओं के बारे में विवेक की तो बात ही रहने दो। परमेश्वर का धन्यवाद कि मैं शैतान के सताने से कुछ सीखने में सक्षम रही।

हालाँकि, मुझे जिस बात का अहसास नहीं हुआ था वो ये था कि मुझे लेकर शैतान का काम खत्म नहीं हुआ था। एक महीने बाद, शैतान ने मेरे खिलाफ फिर हमला किया ...

शैतान एक बार फिर अपनी कपटी चालें चलता है

एक दिन, मेरी बाईं आँख अचानक सूज गई। यह लाल हो गयी और मेरी पलक भी सूज गयी। इससे दर्द और खुजली दोनों हो रही थी। इससे मेरी दृष्टि धुंधली हो गई थी। मुझे चिंता होने लगी, मैं डरने लगी कि, अगर मेरी आँख की स्थिति बदतर हो गयी, तो मैं काम नहीं कर पाऊँगी। मैं मानसिक रूप से कमज़ोर महसूस कर रही थी, लेकिन मैं परमेश्वर से प्रार्थना करती रही: "हे परमेश्वर, मेरा विश्वास है कि तू सभी चीजों पर प्रभुता रखता है, इसलिए चाहे कुछ भी हो जाए, मैं तुझ पर विश्वास करती रहूँगी।"

बाद में, मैं इसकी जांच के लिए अस्पताल गयी, वहाँ के डॉक्टर ने कहा कि मेरी आँख संक्रमित हो गई थी, और मुझे कुछ एंटीबायोटिक्स दिए। लेकिन गोलियों का कोई प्रभाव नहीं हुआ, और रात में इतना दर्द हुआ कि मैं सो नहीं पायी। मेरा दिल उलझन में पड़ गया, और मैंने मन ही मन सोचा: "मैं अचानक बीमार क्यों पड़ गयी हूँ? क्या अब भी शैतान मुझे परेशान करने की कोशिश कर रहा है? परमेश्वर ने फिर से मेरे साथ ऐसा क्यों होने दिया? यदि मैं अपनी आँखों की दृष्टि खो देती हूँ, तो मैं क्या करूँगी?" मुझे ऐसा लगा जैसे मैं और अधिक नहीं सह पाऊँगी और मेरा परमेश्वर के वचनों को पढ़ने का बिल्कुल मन नहीं था। यहाँ तक कि मेरी प्रार्थनाओं में भी कोई भाव नहीं था, और मैं अब सभाओं में शामिल होना नहीं चाहती थी।

जब कलीसिया में मेरी बहन को पता चला कि मैं फिर से बीमार हो गई हूँ, तो उसने मेरे लिए परमेश्वर के वचनों को पढ़ा: "लोगों के विश्वास की आवश्यकता तब होती है जब किसी चीज को नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है, और तुम्हारे विश्वास की तब आवश्यकता होती है जब तुम अपनी स्वयं की धारणाओं को नहीं छोड़ पाते हो। जब तुम परमेश्वर के कार्यों के बारे में स्पष्ट नहीं होते हो, तो आवश्यकता होती है कि तुम विश्वास बनाए रखो और तुम दृढ़ रवैया रखो और गवाह बनो। जब अय्यूब इस स्थिति तक पहुँचा, तो परमेश्वर उसे दिखाई दिया और उससे बोला। अर्थात्, यह केवल तुम्हारे विश्वास के भीतर से ही है कि तुम परमेश्वर को देखने में समर्थ होगे, और जब तुम्हारे पास विश्वास है तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनायेगा। विश्वास के बिना, वह ऐसा नहीं कर सकता है। परमेश्वर तुम्हें वह सब प्रदान करेगा जिसको प्राप्त करने की तुम आशा करते हो। यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं है, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है और तुम परमेश्वर के कार्यों को देखने में असमर्थ होगे, उसकी सर्वसामर्थ्य को तो बिल्कुल भी नहीं देख पाओगे। जब तुम्हारे पास यह विश्वास होता है कि तुम अपने व्यवहारिक अनुभव में उसके कार्यों को देख सकते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट होगा और भीतर से वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। उस विश्वास के बिना, परमेश्वर ऐसा करने में असमर्थ होगा। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास खो चुके हो, तो तुम कैसे उसके कार्य का अनुभव कर पाओगे?"

बहन की संगति सुनने

उस बहन ने फिर संगति दी। "सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से हम देख सकते हैं कि जब हम ऐसी समस्याओं का सामना करते हैं जिन्हें हम पूरी तरह से समझते नहीं हैं, या जो हमारे देह के हितों के अनुरूप नहीं होती हैं, तब हमें परमेश्वर में विश्वास होना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता है और चाहे कोई भी परिस्थिति हो, उन सबके पीछे परमेश्वर की भली मंशा होती है, और केवल परमेश्वर के प्रति अपना विश्वास बनाये रखने से ही हम उसके कार्यों को देख पाएंगे। उदाहरण के लिए, अय्यूब को लीजिए। जब शैतान के द्वारा उसकी परीक्षा ली जा रही थी और उसने अपनी धन-संपत्ति, अपने दस बच्चे, सब कुछ खो दिया, तब भले ही वह इस बात से अनजान था कि शैतान उसकी परीक्षा ले रहा था, भले ही वह परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझता था, किन्तु उसने परमेश्वर को अस्वीकार नहीं किया या परमेश्वर को धोखा नहीं दिया। इसके बजाय, उसने यहोवा का नाम ऊँचा किया और वह परमेश्‍वर की गवाही देने में दृढ़ रहा। जब एक बार फिर शैतान ने उसकी परीक्षा ली, और उसका पूरा शरीर दर्दनाक फोड़ों से भर गया, तो वह बस राख के बीच बैठ अपने शरीर को एक बर्तन के टूटे टुकड़े से कुरेद ही पा रहा था। उसकी पत्नी ने उसका मज़ाक उड़ाया, और उससे परमेश्वर को अस्वीकार करवाने का प्रयास किया। लेकिन अत्यंत पीड़ा में होने पर भी अय्यूब का विश्वास कभी नहीं डगमगाया और उसने अपनी पत्नी को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा, 'क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें?' बार-बार शैतान के प्रलोभनों से गुज़रते हुए, उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि उसने अपनी भौतिक संपत्ति खोयी, अपने प्यारे बच्चों को खोया या उसने अपना शारीरिक स्वास्थ्य खोया, इस पूरे वक्त उसने परमेश्वर पर अपना विश्वास बनाए रखा; अपने ऊपर आई विपत्तियों के कारण उसने परमेश्वर से इनकार या विश्वासघात नहीं किया, एक बार भी पापमय बातें नहीं कीं। जब शैतान ने अय्यूब के सच्चे विश्वास को देखा, तो वह शर्म से पीछे हट गया और फिर कभी अय्यूब की परीक्षा लेने की कोशिश नहीं की। परमेश्वर ने भी अय्यूब को दर्शन दिया और उससे बात की, अय्यूब को दोहरा आशीष मिला। हम अय्यूब के अनुभवों से देख सकते हैं कि ऐसी चीज़ों के पीछे, जिसे हम पूरी तरह से नहीं समझते हैं, ख़ास तौर पर अनचाही परिस्थितियों के पीछे, हमेशा परमेश्वर की इच्छा होती है और उनमें हमेशा शैतान द्वारा परीक्षा और उत्पीड़न शामिल होते हैं। अगर हमें परमेश्वर पर सच्चा विश्वास है तो चाहे हम कितनी ही बड़ी विपदा का सामना क्यों न करें, हम हमेशा परमेश्वर की तरफ खड़े रहने, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने, परमेश्वर से प्रार्थना करने, उसकी आराधना करने में समर्थ रहेंगे और परमेश्वर से शिकायत नहीं करेंगे—अपनी गवाही में दृढ़ रहने का यही मतलब होता है। इसके बाद ही एक व्यक्ति परमेश्वर के आशीषों को पाने के योग्य होता है। इसलिए, एक बार जब हम परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू कर देते हैं, तो भले ही हम बार-बार बीमार पड़ें, भले ही यह बाहर से एक बुरी चीज़ मालूम दे, यह वास्तव में परमेश्वर का विशेष आशीष है। एक ओर, परमेश्वर चाहता है कि हम अपनी बीमारियों से शैतान के इस पापी इरादे का एहसास करें कि वह हमें निगल जाने के लिए जो हो सके वो करेगा, वहीं दूसरी ओर, परमेश्वर हमारे विश्वास को परखने के लिए शैतान की कपटपूर्ण चालों का उपयोग करता है, यह देखने के लिए कि क्या हम वास्तव में उस पर विश्वास करते हैं। जब हम अपनी गवाही में दृढ़ रहते हैं और हम परमेश्वर को संतुष्ट करते हैं, तब हम परमेश्वर के चमत्कारिक कार्यों को देखने में सक्षम होते हैं। परमेश्वर पर हमारा विश्वास बढ़ता जाता है, और यह परमेश्वर का आशीष है।"

बहन की संगति सुनने के बाद मुझे बहुत शर्म आई। मैंने सोचा कि जब मैं बीमार पड़ी तो कैसे मैं एक मूक गलतफहमी और दोषारोपण की स्थिति में जी रही थी। मुझे परमेश्वर में ज़रा भी सच्चा विश्वास नहीं था। जब मैंने यह सोचा, तो मैंने व्यथित महसूस किया, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! तेरे व्यवहारिक खुलासों ने मुझे दिखाया है कि मुझे तुझ पर ज़रा भी भरोसा नहीं है और सभी चीज़ों पर तेरी संप्रभुता में जो सामर्थ्य और अधिकार निहित है, उसकी मुझे थोड़ी सी भी समझ नहीं है। जब दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियां मुझे घेर लेती हैं तो मैं नकारात्मक हो जाती हूँ और मैं तुझे गलत समझ बैठती हूँ—मैं वास्तव में बहुत शर्मिंदा हूँ। हे परमेश्वर, मैं तेरे समक्ष पश्चाताप करना चाहती हूँ। चाहे शैतान मुझे कैसे भी परेशान क्यों न करे, चाहे मैं कितना भी बीमार क्यों न हो जाऊँ, मेरी आँख की दृष्टि रहे या जाये, सब कुछ तेरे हाथों में है, मैं तुझ पर विश्वास करने और तेरा अनुसरण करने के लिए संकल्पित हूँ।" इसके बाद, मैंने नियमित रूप से सभाओं में भाग लिया और मेरा दिल अब मेरी बीमारी से विवश नहीं था। मुझे तब बड़ा आश्चर्य हुआ जब एक हफ्ते बाद, मेरी आँख की बीमारी ठीक हो गई। मैंने परमेश्वर के चमत्कारिक कार्यों को देखा था, मैं खुशी से फूली नहीं समा रही थी। मैंने अपने पूरे हृदय से परमेश्वर को धन्यवाद दिया!

एक बार फिर से परीक्षण

एक महीने बाद, मेरी दाहिनी आँख बहुत सूज गयी और इस बार, मेरी भौं और गाल भी सूज गए और उनमें दर्द हो रहा था। जब भी मैं अपनी आँख झपकाती, तो और ज़्यादा जलन और दर्द होता था। मैंने तुरंत डॉक्टर को दिखाया, मुझे एंटीबायोटिक्स और आँख में डालने के लिए ड्रॉप दिए गए। लेकिन एंटीबायोटिक लेने के बाद मेरी आँख बेहतर नहीं हुई। मैंने तीन बार डॉक्टर को दिखाया, लेकिन मेरी आँख में सूजन बनी रही। अपने दर्द के बीच, यह देखकर कि मुझ पर इलाज का कोई असर नहीं हो रहा था, मैंने महसूस किया कि यह शायद शैतान ही था जो मुझे फिर से सताने की कोशिश कर रहा था। इस बार चाहे जो हो जाये, मैं फिर से परमेश्वर को न तो गलत समझूँगी, न दोष दूँगी, और मैं कलीसिया की सभाओं में जाना बंद नहीं करुँगी। इसलिए, मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़ती रही और सभाओं में भाग लेती रही। कुछ दिनों के बाद भी मेरी आँख में असहनीय दर्द था। मैं अपनी दाईं आँख से देख नहीं पा रही थी, इसलिए मैं बस भजन सुन रही थी। तब भी मुझे कुछ कमज़ोरी महसूस हो रही थी। तब मैं उस समय की बात सोचने से खुद को रोक नहीं पायी जब एक बैपटिस्ट के रूप में मैं प्रभु में विश्वास किया करती थी, सब कुछ बढ़िया और अद्भुत था। और अब मुझे बार-बार शैतान के हमलों और परीक्षणों को सामना करना पड़ रहा है, इन बीमारियों का दर्द सहना पड़ रहा है—सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करना कितना कठिन है!

बाद में, एक सभा में, कलीसिया से मेरी एक बहन ने देखा कि मैं बहुत निराश महसूस कर रही हूँ और इसलिए उसने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश भेजा: "क्या तुम शैतान के प्रभाव में जी कर, और शांति, आनंद और थोड़े-बहुत दैहिक सुख के साथ जीवन बिताकर संतुष्ट हो? क्या तुम सभी लोगों में सबसे अधिक निम्न नहीं हो? उनसे ज्यादा मूर्ख और कोई नहीं है जिन्होंने उद्धार को देखा तो है लेकिन उसे प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते; वे ऐसे लोग हैं जो पूरी तरह से देह-सुख में लिप्त होकर शैतान का आनंद लेते हैं। तुम्हें लगता है कि परमेश्वर में अपनी आस्था के लिए तुम्‍हें चुनौतियों और क्लेशों या कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा। तुम हमेशा निरर्थक चीजों के पीछे भागते हो, और तुम जीवन के विकास को कोई अहमियत नहीं देते, बल्कि तुम अपने फिजूल के विचारों को सत्य से ज्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो!"

परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए, मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर की बातें वास्तव में मेरी वास्तविक स्थिति के बारे में ही थीं। मैं आशीष और अनुग्रह प्राप्त करने के लिए ही परमेश्वर पर विश्वास करती थी ताकि मैं शारीरिक रूप से भली-चंगी रह सकूँ। मैं सत्य का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर रही थी, परमेश्वर से प्यार करने और संतुष्ट करने के लिए विश्वास करने की तो बात ही दूर है। इसके अलावा, मैं अपने दिल में एक गलत दृष्टिकोण पाले बैठी थी, जो यह था कि, एक बार जब हम परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करते हैं, तो कामकाज में या जीवन में, परमेश्वर की कृपा और आशीष हमारे साथ होना चाहिए, और हमेशा परमेश्वर को हम पर नज़र रखनी चाहिए, रक्षा करनी चाहिए। एक बार जब मैंने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया, और इस कारण से बीमार हो गयी तो मैंने बहुत व्यथित महसूस किया और परमेश्वर को गलत समझा, दोषी ठहराया, इस हद तक कि मैं परमेश्वर को छोड़ना भी चाहती थी। मैंने देखा कि मैं कोई ऐसी व्यक्ति नहीं थी जो परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखती हो या जो परमेश्वर की आराधना करती हो, बल्कि मैं परमेश्वर में अपने विश्वास को आशीष और अनुग्रह प्राप्त करने के लिए उपयोग करना चाहती थी—मैं इतनी स्वार्थी, घृणायोग्य ​​और बेवकूफ़ थी! मैं एक सृजित प्राणी हूँ, और चाहे परमेश्वर अनुग्रह और आशीष दे या न दे, मुझे हमेशा उसमें विश्वास करना चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। अंत के दिनों में, परमेश्वर बहुत सारे सत्य व्यक्त करने के लिए स्वयं देह में आया है ताकि हमारे जीवन के लिए प्रदान कर सके और हमारे भ्रष्ट स्वभावों को साफ़ कर सके। और फिर भी मैं सत्य या जीवन का अनुसरण नहीं कर रही थी, बल्कि क्षणिक भौतिक सुख-सुविधा का पीछे भाग रही थी। ऐसा करने से, क्या मैं उन लोगों में से एक नहीं थी, जिनके बारे में परमेश्वर ने कहा था कि, "उन से ज़्यादा मूर्ख और कोई नहीं है"? अनुसरण पर इस तरह के विचारों के साथ, मैं कभी भी परमेश्वर की प्रशंसा कैसे प्राप्त कर सकती थी? अंत में मुझे क्या हासिल होगा? उस समय, मैंने अंत में माना कि जो भी मेरे साथ होता है उसके पीछे परमेश्वर की भली मंशा है, क्योंकि अगर परमेश्वर ने मुझे इस तरह से उजागर नहीं किया होता, तो मैं कभी भी अनुसरण पर अपने गलत विचारों को पहचानने में सक्षम नहीं होती, मेरे बदलने का तो सवाल ही नहीं है। और अगर मैंने उस तरह से परमेश्वर पर विश्वास करना जारी रखा होता, तो मैं कभी उनकी प्रशंसा प्राप्त नहीं कर पाती! एक बार जब मैं परमेश्वर की इच्छा को समझ गयी, तो मेरे दिल ने अचानक मुक्ति की भावना महसूस की। मुझे पता चल गया कि मुझे भविष्य में परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर कैसे चलना चाहिए।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों को और भी ध्यान से पढ़ा और मुझे परमेश्वर पर भरोसा करने का विश्वास मिला। मेरी बीमारी ठीक हो या ना हो, मैं परमेश्वर को दोष नहीं दूँगी, बल्कि सभाओं में जाना और अपना कर्तव्य निभाना जारी रखूंगी। जब मैंने इस तरह से अभ्यास करना शुरू किया, तो मेरा मन अब परेशान नहीं रहता था, और मुझे अब अपनी बीमारी की चिंता नहीं होती थी। जैसे-जैसे समय बीतता गया, मेरी आँख धीरे-धीरे बेहतर हो गई।

अनुभव के बाद समझ आती है

इन अनुभवों के बाद, मैं समझ गयी कि जो बीमारियाँ हम सभी को होती हैं, उनके पीछे परमेश्वर की भली मंशा है। एक ओर, मेरे अनुभवों ने मुझे स्पष्ट रूप से शैतान के घृणित, बुरे और बदसूरत चेहरे को देखने दिया; वह लगातार हम पर हमला करने और हमारी परीक्षा लेने की पूरी कोशिश करता रहता है ताकि हम परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर दें। दूसरी ओर, बार-बार बीमार पड़ने से मैं यह देख पायी कि मुझे परमेश्वर पर थोड़ा भी सच्चा विश्वास नहीं है, साथ ही अनुसरण पर मेरे गलत विचारों का भी समाधान हुआ, और मैंने देखा कि परमेश्वर कितना सर्वशक्तिमान और बुद्धिमान है! परमेश्वर के वचन सत्य हैं: वे हमें विश्वास और शक्ति दे सकते हैं, हमें शैतान के प्रलोभनों और उत्पीड़न से बच निकलने में सक्षम कर सकते हैं, और वे हमें परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग पर ले जा सकते हैं। मैं अब परमेश्वर के प्रति विश्वास से भर गयी हूँ, और भविष्य में चाहे कोई भी कठिनाई क्यों न आये, मैं हमेशा परमेश्वर से प्रार्थना करुँगी और परमेश्वर पर भरोसा रखूंगी, परमेश्वर की इच्छा तलाशुंगी, सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने की पूरी कोशिश करुँगी!

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