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प्रभु की वापसी का स्वागत करने के लिए हमें किस प्रकार "तैयार" रहना चाहिए?

आज, विश्व भर में सभी प्रकार की आपदाएं कहीं अधिक भीषण हो गयी हैं, और प्रभु की वापसी की कई भविष्यवाणियाँ मूलत: पूर्ण हो चुकी हैं। हम सभी ईसाई उत्सुकता से अपने स्वर्गारोहण के लिए प्रभु के आगमन का इंतज़ार कर रहे हैं। मैं प्रभु यीशु के इन वचनों के बारे में सोचता हूँ, "इसलिये तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा" (मत्ती 24:44)। प्रभु हमें याद दिलाते हैं की हमें गम्भीर भाव के साथ स्वयं को उनकी वापसी के लिए तैयार करना चाहिए। लेकिन हमें ऐसा आखिर किस प्रकार करना चाहिए?

प्रभु की वापसी का स्वागत करने के लिए हमें किस प्रकार

1. हम अपने "आध्यात्मिक कान" तैयार करें और प्रभु की वाणी सुनना सीखें

प्रकाशितवाक्य की किताब में कई बार यह भविष्यवाणी की गयी है कि, "जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 2:7)। और प्रभु यीशु ने कहा है, "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)। बाइबल के ये दो अंश हमें याद दिलाते हैं कि हमें कलीसियाओं को कहे गये पवित्र आत्मा के वचनों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। जब प्रभु "खटखटाते" हैं तो हमें प्रभु की वाणी सुनने पर ध्यान देना चाहिए, प्रभु की वाणी परमेश्वर के वचनों को संदर्भित करती है। प्रभु यीशु ने एक बार भविष्यवाणी की थी, "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। इस पाठ से हम देख सकते हैं कि, जब प्रभु वापस आयेंगे, तो वे बोलेंगे, कार्य करेंगे, रहस्यों को खोलेंगे, हमें वो सारे सत्य बतायेंगे जिन्हें हम नहीं समझते हैं और हमें सारे सत्य समझायेंगे और उनमें प्रवेश करायेंगे। प्रभु यीशु ने कहा है, "मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता" (यूहन्ना 14:6)। हम देख सकते हैं कि सत्य परमेश्वर से आता है, तो प्रभु की वापसी निश्चय ही सत्य को लोगों तक लाएगी, उन्हें जीवन प्रदान करेगी और मार्ग दिखाएगी। इस कारण, प्रभु की वापसी के इंतज़ार के सम्बन्ध में, हमें अपने "आध्यात्मिक कान" अवश्य तैयार करने चाहिए, परमेश्वर के वाणी को पहचानने में सक्षम होना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

हम बाइबल में उस दृष्टान्त को भी पा सकते हैं जिसे प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को बताया था: "स्वर्ग का राज्य उस राजा के समान है, जिसने अपने पुत्र का विवाह किया। और उसने अपने दासों को भेजा कि निमन्त्रित लोगों को विवाह के भोज में बुलाएँ; परन्तु उन्होंने आना न चाहा" (मत्ती 22:2-3)। और प्रकाशितवाक्य की किताब कहती है, "फिर मैं ने एक और स्वर्गदूत को आकाश के बीच में उड़ते हुए देखा, जिसके पास पृथ्वी पर के रहनेवालों की हर एक जाति, और कुल, और भाषा, और लोगों को सुनाने के लिये सनातन सुसमाचार था" (प्रकाशितवाक्य 14:6)। प्रभु यीशु हमें बताते हैं कि अंत के दिनों में, परमेश्वर भोज में हमें आमंत्रित करने के लिए अपने सेवकों को भेजेंगे, अर्थात प्रभु की वापसी का संदेशा देने और हम तक इस अनंत सुसमाचार को पहुँचाने के लिए परमेश्वर अपने दूतों को भेजेंगे। अगर हम विनम्रता से खोज और जाँच-पड़ताल करने में सक्षम हैं, उन्हें सुनकर यह स्वीकार और मान सकते हैं कि जिस चीज़ को वे प्रमाणित करते हैं वे परमेश्वर के वचन हैं, प्रभु की वाणी है, तो हम प्रभु की वापसी का स्वागत करेंगे।

2. ऐसे हृदय को तैयार करना जो उदारता से सत्य को खोजता है

प्रभु यीशु ने कहा है, "धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है" (मत्ती 5:3)। "धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्‍त किए जाएँगे" (मत्ती 5:6)। "धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्‍वर को देखेंगे" (मत्ती 5:8)। "क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो कोई अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा" (लूका 14:11)। यहाँ, हम देखते हैं कि यह एक विनम्र व्यक्ति है जो परमेश्वर को प्रसन्न करता है, वह व्यक्ति जो विनम्रतापूर्वक सत्य की तलाश कर सकता है और परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकता है। विशेष रूप से प्रभु के आगमन के महान मामले में, जब कोई हमें गवाही देता है कि प्रभु लौट आए हैं, कि उसने प्रभु की वाणी सुनी है, तो हमें उसके प्रति विनम्र रवैया अपनाना चाहिए। हमें एक जिज्ञासु, विनम्र हृदय से जाँच करनी चाहिए और यह सुनने के लिए कि यह प्रभु की वाणी है या नहीं, हमें अपने "आध्यात्मिक कान" का उपयोग करना चाहिए। वास्तव में खुद को "गम्भीरता से तैयार" करने का यही मतलब है। मुझे विश्वास है कि परमेश्वर हमारा मार्गदर्शन करेंगे, हमें अपनी वाणी को पहचानने, अपनी वापसी का स्वागत करने देंगे। हालाँकि, कूश देश के नपुंसक मनुष्य के पास उच्च हैसियत और प्रतिष्ठा थी, फिर भी वह फिलिप्पुस से विनय करने हेतु खुद को विनम्र करने में सक्षम था। फिलिप्पुस की संगति और गवाही में, उसने परमेश्वर की वाणी को पहचाना। परिणामस्वरूप, उसने प्रभु यीशु का स्वागत किया। नीकुदेमुस, ने भी प्रभु यीशु की कहानी सुनी, वह भी प्रभु यीशु के साथ सत्य की तलाश करने में सक्षम था। प्रभु के वचनों से, उसने पुनर्जन्म के रहस्य को समझा... ऐसे कई उदाहरण हैं।

इसलिए, यदि हम प्रभु की वापसी का स्वागत करना चाहते हैं, तो हमारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए जो उदारता से सत्य की तलाश करता है। हमें परमेश्वर की आवाज सुनना सीखना चाहिए, परमेश्वर के वचनों में परमेश्वर की वाणी को पहचानना चाहिए, और मेम्ने के नक्शेकदम पर चलना चाहिए। मैं कामना करता हूँ कि मेरे सभी भाई-बहन जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर के प्रकटन की लालसा करते हैं, वे जल्द ही प्रभु की वापसी का स्वागत करने में सक्षम हो सकें!

क्या आप यीशु की वापसी का स्वागत करने के बारे में अधिक जानना चाहते हैं? हमारे “प्रभु यीशु का स्वागत करें” पृष्ठ पर या नीचे दी गई सामग्री में ज़्यादा जानकारी पाएं।

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