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मेन्‍यू

क्या आप जानते हैं कि मसीह क्या है और मसीह का सार क्या है?

मैं इस बारे में आश्वस्त हूँ कि हम सभी “मसीह” शब्द से परिचित हैं। बाइबल में कहा गया है, “उसने उनसे कहा, परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो? शमौन पतरस ने उत्तर दिया, तू जीवते परमेश्‍वर का पुत्र मसीह है। यीशु ने उसको उत्तर दिया, हे शमौन, योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है” (मत्ती 16:15-17)। बहुत से लोग इन पदों को पढ़कर बिना सोचे समझे कहते हैं, “मसीह देहधारी प्रभु यीशु है” या “मसीह, परमेश्वर का पुत्र, मसीहा है”, वहीं कुछ अन्य लोग कहते हैं, “मसीह मनुष्य का पुत्र है” “मसीह का अर्थ है अभिषिक्त किया गया।” लेकिन इन दावों को सुनकर कुछ लोग उलझन में पड़ जाते हैं: पुराने नियम के नबी, राजा, और याजक सभी अभिषिक्त थे, तो क्या वे भी मसीह हैं? आखिर मसीह का अर्थ क्या है?

यीशु मसीह का फोटो

इस सवाल का जवाब देने के लिए, आइये सबसे पहले परमेश्वर के वचनों के इन दो अंशों पर नज़र डालें, “देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, तथा मसीह परमेश्वर के आत्मा के द्वारा धारण किया गया देह है। यह देह किसी भी मनुष्य की देह से भिन्न है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह मांस तथा खून से बना हुआ नहीं है बल्कि आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता तथा पूर्ण परमेश्वरत्व दोनों हैं। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य द्वारा धारण नहीं की जाती है। उसकी सामान्य मानवता देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखती है, जबकि दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य करती है।” “परमेश्वर देहधारी हुआ और मसीह कहलाया, और इसलिए वह मसीह, जो लोगों को सत्य दे सकता है, परमेश्वर कहलाता है। इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है… असल मसीह पृथ्वी पर केवल परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि वह देह भी है जिसे धारण करके परमेश्वर लोगों के बीच रहकर अपना कार्य पूर्ण करता है। यह वह देह नहीं है जो किसी भी मनुष्य के द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सके, बल्कि वह देह है, जो परमेश्वर के कार्य को पृथ्वी पर अच्छी तरह से करता है और परमेश्वर के स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और अच्छी प्रकार से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, और मनुष्य को जीवन प्रदान करता है।” ये दो अंश देहधारी परमेश्वर के बारे में सत्य के पहलुओं को प्रकट करते हैं। मसीह देहधारी परमेश्वर का शरीर है, अर्थात्, सामान्य मानवता और सामान्य सोच से युक्त एक दैहिक शरीर में परमेश्वर के आत्मा का साकार रूप। वह मानवीय दुनिया में कार्य करने और बोलने के लिए एक सामान्य सामान्य व्यक्ति बन जाता है। बाहर से, मसीह एक सामान्य और साधारण मनुष्य का पुत्र है, लेकिन वह बनाए गए सभी लोगों से सार में अलग है: सृजे गये मनुष्यों में केवल सामान्य मानवता होती है और कोई दिव्य सार नहीं होता है; लेकिन मसीह के पास न केवल सामान्य मानवता है, बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण, उसके पास पूर्ण दिव्यता है, उसके पास परमेश्वर का सार है, वह संपूर्ण सत्य को व्यक्त कर सकता है, वह परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप व्यक्त कर सकता है, लोगों को सत्य, मार्ग, और जीवन प्रदान कर सकता है। जैसे प्रभु यीशु ने कहा है, “मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ” (यूहन्ना 14:6)। मसीह, धरती पर परमेश्वर का प्रकटन है। दो हज़ार साल पहले, प्रभु यीशु कार्य करने के लिए धरती पर आया, उसने व्यवस्था के युग को समाप्त किया, अनुग्रह के युग की शुरूआत की, छुटकारे के कार्य के लिए आवश्यक सत्य व्यक्त किए, लोगों को उनके पापों को स्वीकार करना, पश्चाताप करना, दूसरों को अपने समान प्रेम करना सिखाया। उसने सभी तरह के चमत्कार किये, जैसे कि बीमारों को चंगा करना, दुष्टात्माओं को बाहर निकालना, अंधों को दृष्टि दान देना, लंगड़ों को चलाना, कुष्ठ रोगियों को चंगा करना, मृतकों को फिर से जीवित करना, पांच हज़ार लोगों को पांच रोटियों और दो मछलियों से खाना खिलाना, एक वचन से हवा और समुद्र को शांत करना, इत्यादि। यह सभी कार्य उसकी दिव्यता की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति थे, साथ ही परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का प्रकटीकरण भी थे। ये ऐसी चीजें हैं जो कोई इंसान न तो धारण कर सकता है और न ही हासिल कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मसीह सामान्य मानवता युक्त एक शारीरिक देह में अपने दिव्य कार्य को व्यक्त करता है, वह कभी भी और कहीं भी, सत्य को व्यक्त कर सकता है। वह मनुष्यों की आपूर्ति, उनका सिंचन और चरवाही करता है, सभी इंसानों को राह दिखाता है ताकि हम कह सकें कि वह ही स्वयं देहधारी परमेश्वर और मसीह है।

तो फिर, नबियों या परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोगों को मसीह क्यों नहीं कहा जा सकता है? यहाँ वास्तव में, तलाश करने के लिए सत्य है। आइए, परमेश्वर के वचन के कुछ अंशों को पढ़ें, “यशायाह, यहेजकेल, मूसा, दाऊद, अब्राहम और दानिय्येल इस्राएल के चुने हुए लोगों में से अगुवे या भविष्यद्वक्ता थे। उन्हें परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया था? क्यों पवित्र आत्मा ने उनकी गवाही नहीं दी? क्यों जैसे ही यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया और अपने वचनों को बोलना आरम्भ किया तो पवित्र आत्मा ने यीशु की गवाही दी? और क्यों पवित्र आत्मा ने अन्य लोगों की गवाही नहीं दी? जो मनुष्य हाड़-माँस के थे, उन्हें, ‘प्रभु’ कहकर पुकारा जाता था। इस बात की परवाह किये बिना कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता था, उनका कार्य उनके अस्तित्व और सार को दर्शाता है, और उनका अस्तित्व और सार उनकी पहचान को दर्शाता है। उनका सार उनकी पदवियों से सम्बंधित नहीं है; जो कुछ वे अभिव्यक्त करते थे, और जैसा जीवन वे जीते थे उसके द्वारा इसे दर्शाया जाता है। पुराने नियम में, प्रभु कहकर पुकारा जाना सामान्य बात से बढ़कर और कुछ नहीं था, और किसी भी व्यक्ति को किसी भी तरह से पुकारा जा सकता था, परन्तु उसका सार और अंतर्निहित पहचान अपरिवर्तनीय रहती थी।” “देहधारी परमेश्वर के वचन एक नया युग आरंभ करते हैं, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करते हैं, रहस्यों को प्रकट करते हैं, और एक नये युग में मनुष्य को दिशा दिखाते हैं। मनुष्य द्वारा प्राप्त की गई प्रबुद्धता मात्र एक आसान अभ्यास या ज्ञान है। वह समस्त मानवजाति को एक नये युग में मार्गदर्शन नहीं दे सकती है या स्वयं परमेश्वर के रहस्य को प्रकट नहीं कर सकती है। परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है, और मनुष्य मनुष्य ही है। परमेश्वर में परमेश्वर का सार है और मनुष्य में मनुष्य का सार है।” इन अंशों से, हम आसानी से देख सकते हैं कि प्रभु यीशु मसीह का सार परमेश्वर है, इसीलिए वह स्वयं परमेश्वर का कार्य कर सकता है, परमेश्वर के स्वरूप को व्यक्त कर सकता है, और लोगों को सत्य, मार्ग और जीवन प्रदान कर सकता है। उसकी जगह पर या किसी अन्य समय, कोई दूसरा व्यक्ति यह नहीं कर सकता था। जो लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट किये जाते हैं, उनके पास केवल मानवता होती है, वे सत्य को व्यक्त नहीं कर सकते हैं, परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते हैं। जैसे पुराने नियम में व्यवस्था के युग में, मूसा, दानिय्येल और यशायाह जैसे कई प्राचीन नबी, व्यवस्था के युग में परमेश्वर के कार्य के आधार पर सभी लोगों को आज्ञाओं और परमेश्वर के वचनों का पालन करने के लिए प्रेरित करते थे, परमेश्वर के निर्देशानुसार इस्राएलियों के बीच भविष्यवाणियाँ को प्रचार करते थे, या अनुस्मारक या चेतावनी जैसे परमेश्वर के वचनों को इस्राएलियों तक पहुंचाते थे, आदि, जो कि पूरी तरह से मनुष्य के कर्तव्यों के तहत आता है। परमेश्वर के निर्देशों के बिना, परमेश्वर के वचनों को व्यक्त करने की उनकी भूमिका समाप्त हो जाती। इससे साबित होता है कि नबियों के पास खुद का कोई सत्य या मार्ग नहीं था। वे केवल ऐसे लोग थे जो परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गये थे और पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग देते थे। भले ही उन्हें अभिषिक्त कहा जाता है, लेकिन वे मसीह नहीं हैं। इस प्रकार, परमेश्वर के पास परमेश्वर का सार है, मनुष्य के पास मनुष्य का सार है। यह निर्धारित करने के लिए कि क्या कोई मसीह है, यह देखने की आवश्यकता है कि क्या उसके पास परमेश्वर का सार है, क्या वह सत्य को व्यक्त कर सकता है, और क्या वह मानवजाति को बचाने का कार्य कर सकता है, न कि उस नाम पर ध्यान देने की ज़रूरत है जिससे वह पुकारा जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सृजित मनुष्य को क्या कहकर पुकारा जाता है, वे हमेशा मनुष्य ही होते हैं, मसीह नहीं। इसलिए, हम मसीह को परमेश्वर के आत्मा के देहधारी शरीर के रूप में समझ सकते हैं। मसीह का सार सामान्य मानवता और पूर्ण दिव्यता का संयोजन है। वह धरती पर स्वयं परमेश्वर है।

इस संगति के बाद, मुझे विश्वास है कि अब हममें इस बात कि थोड़ी-बहुत समझ हो गयी है कि मसीह क्या है। सत्य के इस पहलू को अधिक स्पष्टता से समझने के लिए, हमें और अधिक चिंतन और तलाश करने की भी आवश्यकता है, क्योंकि यह प्रभु की वापसी को स्वीकार करने में हमारे लिए बहुत सहायक है। बाइबल में भविष्यवाणी की गयी है, “क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्‍चिम तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा” (मत्ती 24:27)। “क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से कौंध कर आकाश के दूसरे छोर तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी अपने दिन में प्रगट होगा। परन्तु पहले अवश्य है कि वह बहुत दु:ख उठाए, और इस युग के लोग उसे तुच्छ ठहराएँ” (लूका 17:24-25)। इन भविष्यवाणियों में “मनुष्य के पुत्र का भी आना” का उल्लेख किया गया है, और हम सभी जानते हैं कि देहधारी प्रभु यीशु को मनुष्य का पुत्र और मसीह कहा जाता है। इसलिए बहुत संभावना है कि प्रभु यीशु द्वारा उल्लिखित “मनुष्य के पुत्र का भी आना” अंत के दिनों में लौटने वाले देहधारी परमेश्वर को संदर्भित करता है। हम देहधारी परमेश्वर को और अंत के दिनों के मसीह को कैसे समझते हैं, इसका सीधा संबंध इस बात से है कि हम परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर सकते हैं या नहीं। इसलिए यदि हमें प्रभु का प्रकटन प्राप्त करना है तो हमें ध्यान से परमेश्वर के कार्य और वचनों की खोज करनी चाहिए, साथ ही साथ परमेश्वर की वाणी को ध्यानपूर्वक सुनने का प्रयास करना चाहिए।

हमारे ‘यीशु मसीह को जानना‘ पेज पर और अधिक पढ़ने के लिए आपका स्वागतहै, इसके अलावा, आप नीचे दी गई सामग्री के बारे में अधिक जान सकते हैं। ये प्रभु यीशु को जानने और उनके दूसरे आगमन का स्वागत करने में आपकी मदद करेंगे।