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उद्धारकर्ता आकर मनुष्य को कैसे बचाता है?

उद्धारकर्ता के बारे में सभी विश्वासी मानते हैं, कि वह अंत के दिनों में, मनुष्य को बचाने के लिए पृथ्वी पर ज़रूर आयेगा। अनेक नबियों ने कहा है कि उद्धारकर्ता अंत के दिनों में आयेगा। तो उद्धारकर्ता कौन है? अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग व्याख्या है, अलग-अलग धर्म उसके बारे में अलग-अलग बातें कहते हैं। तो सच्चा उद्धारकर्ता कौन है? सच्चा उद्धारकर्ता स्वर्ग, पृथ्वी और सारी चीज़ों का सृजन करनेवाला प्रभु है, वही सृजनकर्ता, एकमात्र सच्चा परमेश्वर है। सबका सृजन करनेवाला प्रभु ही एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, और देहधारी सच्चा परमेश्वर ही वह उद्धारकर्ता है जो मनुष्य को बचा सकता है। अगर यह सबका सृजन करनेवाला सच्चा परमेश्वर नहीं है, तो यह व्यक्ति सृजनकर्ता नहीं है और मनुष्य को नहीं बचा सकता। इस बात पर हमें स्पष्ट होना चाहिए। याद रखिए! सच्चा परमेश्वर केवल एक है, केवल देहधारी परमेश्वर ही उद्धारकर्ता है। केवल देहधारी सच्चा परमेश्वर ही सत्य व्यक्त कर सकता है, मनुष्य को पूरी तरह से बचा सकता है, और हमें एक सुंदर मंज़िल तक पहुंचा सकता है। झूठे परमेश्वर बहुत-से हैं, सबकी सूची बनाने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन सच्चा उद्धारकर्ता सिर्फ एक ही है। तो फिर, यह उद्धारकर्ता असल में है कौन? 2,000 साल पहले, प्रभु यीशु ने आकर कहा था, "मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है" (मत्ती 4:17)। फिर मनुष्य के पापों से छुटकारे के लिए उसे सूली पर चढ़ा दिया गया। उसने छुटकारे का काम पूरा करके अनुग्रह का युग शुरू किया, लोगों को अनुमति दी कि वे परमेश्वर के सामने आ सकें, उससे प्रार्थना और बातचीत कर सकें, और अब तक उसका अनुसरण कर सकें। यह प्रभु यीशु का छुटकारे का कार्य था। प्रभु यीशु उद्धारकर्ता था जिसने मनुष्य के बीच आकर काम किया। अब तक हमने जो कुछ देखा, उसके आधार पर उद्धारकर्ता कौन है? देहधारी परमेश्वर जो मनुष्य को बचाने के लिए स्वयं आता है। प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य किया, लोगों के पाप क्षमा किए, लेकिन लोग अभी भी लगातार पाप करते हैं, और सच्चा प्रायश्चित नहीं कर पाते। परमेश्वर का उद्धार कार्य इसलिए है कि लोग सच्चा प्रायश्चित कर सकें, इसलिए नहीं कि सिर्फ हमारे पापों को माफ़ कर काम बंद कर दे। यही कारण है कि प्रभु यीशु ने वचन दिया कि अंत के दिनों में वह मनुष्य को पूरी तरह से बचाने के लिए वापस आयेगा। उद्धारकर्ता अब लौट आया है और हमारे बीच है। उसने मनुष्य को शुद्ध करने और हमें पाप से बचाने के लिए समस्त सत्य व्यक्त किये हैं, ताकि हम पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ सकें और उसे हासिल हो जाएं, फिर हमारे लिए उसके द्वारा बनायी गयी सुंदर मंज़िल—उसके राज्य में, प्रवेश कर सकें। अब दुनिया भर में बहुत-से ऐसे लोग हैं जिन्होंने परमेश्वर की वाणी सुनी है, जिन्हें उसके सिंहासन के सामने उठाया गया है। परमेश्वर उनका न्याय कर उन्हें शुद्ध कर रहा है, उनके पास सुंदर गवाही है। ये विजेता हैं, जिन्हें परमेश्वर ने पूरा किया है। मगर दुख की बात है कि अभी भी बहुत-से ऐसे हैं जिन्होंने परमेश्वर की वाणी नहीं सुनी है, जिन्होंने परमेश्वर का प्रकटन और कार्य नहीं देखा है। यही कारण है कि अभी हम गवाही दे रहे हैं कि उद्धारकर्ता मनुष्य को कैसे बचाता है।

उद्धारकर्ता आकर मनुष्य को कैसे बचाता है?

जब हम उद्धार की बात करते हैं, तो कुछ लोगों के मन में यह धुंधला-सा विचार होता है कि परमेश्वर अचानक आसमान से नीचे उतरेगा और विश्वासियों को सीधे ऊपर ले जाएगा, वे लोग विपत्तियों से बचकर सीधे स्वर्ग पहुँच जाएंगे। यह एक इंसानी धारणा और कल्पना है, यह वास्तविक नहीं है। एक और भी अहम समस्या है। लोगों को शैतान ने गहराई से भ्रष्ट कर दिया है और उनकी प्रकृति शैतानी है। सभी लोग पाप का जीवन जी रहे हैं, गंदगी और भ्रष्टता से भरपूर। क्या हम वास्तव में सीधे स्वर्गारोहित हो सकेंगे? क्या हम स्वर्ग के राज्य के लायक हैं? अगर सब लोग इस धारणा से चिपककर, उद्धारकर्ता के उतरने का इंतज़ार करेंगे, तो कुछ भी नहीं होनेवाला। वे विपत्तियों में फंस जाएंगे, रोयेंगे, अपने दांत पीसेंगे। तो फिर यहाँ आने पर उद्धारकर्ता मनुष्य को कैसे बचाता है? अव्वल तो वह हमें पाप से बचाता है। प्रभु यीशु ने बस छुटकारे का कार्य किया ताकि हमारे पाप माफ़ हो सकें, लेकिन इस माफी के बावजूद, हम अब भी पाप किये बिना नहीं रह पाते। हम पाप की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाये हैं। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। परमेशवर पवित्र और धार्मिक है। वह एक पवित्र स्थान के लिए प्रकट होता है और गंदगी की भूमि से खुद को छुपा लेता है। अपवित्र होने के कारण, लोग परमेश्वर को नहीं देख सकते, तो हम पाप में जीनेवाले लोग, परमेश्वर के राज्य में प्रवेश के लायक कैसे हो सकते हैं? इसीलिए परमेश्वर अंत के दिनों में फिर से देहधारी हुआ है और सत्य व्यक्त कर रहा है, लोगों को पूरी तरह से शुद्ध करने और हमें पाप, और शैतान से बचाने के लिए न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है, जैसे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : "यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति की मुक्ति का कार्य पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए यीशु को न केवल पाप-बलि बनने और मनुष्य के पाप वहन करने की आवश्यकता थी, बल्कि मनुष्य को उसके शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए स्वभाव से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, अब जबकि मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया है, परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए वापस देह में लौट आया है, और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया है। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले गया है। वे सब, जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')।

उद्धारकर्ता आ चुका है। प्रभु यीशु देहधारण कर देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में लौट आया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने समस्त सत्य व्यक्त किया है जो मनुष्य को शुद्ध कर उसे बचाता है, परमेश्वर के घर से शुरू करके न्याय का कार्य कर रहा है। देहधारी परमेश्वर के अलावा कोई भी, चाहे वह कितना भी महान और प्रसिद्ध क्यों न हो, सत्य व्यक्त कर मनुष्य को बचा नहीं सकता है। पृथ्वी पर आनेवाला देहधारी परमेश्वर ही मसीह है, हमारा उद्धारकर्ता है। "मसीह" के मायने क्या हैं? इसका अर्थ है उद्धारकर्ता तो फिर, अंत के दिनों का मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्य को शुद्ध कर बचाने के लिए न्याय कार्य कैसे करता है?

सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमें बताता है : "अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन तमाम विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

अंत के दिनों में, परमेश्वर हमारी पापी प्रकृति उजागर करने के लिए सत्य व्यक्त कर मनुष्य को बचाता है, ताकि हम अपनी पापी प्रकृति के मूल को देख कर, शैतान द्वारा हमारी भ्रष्टता की सच्चाई समझ सकें। जब एक इंसान यह पहचान लेता है, तो उसे सच्चा पछतावा हो सकता है, वह खुद से घृणा और नफरत कर सकता है। वह सच्चे दिल से प्रायश्चित कर सकता है, वह केवल सत्य समझने और हासिल करने को तरसता है। जब वह सत्य का अभ्यास करने लायक हो जाता है, तो उसे परमेश्वर के सामने समर्पण करना आ जाता है। वह सत्य समझ लेता है और परमेश्वर के वचन और सत्य के अनुसार जीवन जीता है, तो उसका जीवन स्वभाव बदलने लगता है। परमेश्वर के वचनों के न्याय का लगातार अनुभव करने से आखिरकार उसके भ्रष्ट स्वभाव का शुद्धिकरण हो जाता है। यह ऐसा व्यक्ति है जिसे पूरी तरह बचा लिया गया है, और फिर वह परमेश्वर द्वारा मनुष्य के लिए बनायी गयी सुंदर मंज़िल में प्रवेश कर सकता है। इसीलिए हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना होगा। हमें सच्चाई से प्रायश्चित करना चाहिए, सच में बदलना चाहिए, ऐसा इंसान बनना चाहिए, जो परमेश्वर को समर्पित होकर उसकी आराधना करे। यही सच्ची मुक्ति है, और यही हमें उसके राज्य में प्रवेश के लायक बनाता है।

अब हम लोग एक बात पर यकीनन स्पष्ट हैं। केवल परमेश्वर, केवल सृजनकर्ता ही मनुष्य को बचाकर उस सुंदर मंजिल तक ले जा सकता है। यही परमेश्वर, यही सृजनकर्ता, आज तक, इस पूरे समय में मनुष्य का मार्गदर्शन कर उसे बचाने के लिए बोलता और कार्य करता रहा है, पूरी बाइबल परमेश्वर के प्रकटन और कार्य की गवाही है। यह सत्यापन करती है कि स्वर्ग और पृथ्वी और सारी चीज़ें परमेश्वर द्वारा रची गयी थीं, यह सृजनकर्ता के प्रकटन और कार्य की गवाही देती है। हमारे बीच आनेवाला यह सच्चा देहधारी परमेश्वर ही उद्धारकर्ता है। केवल वही मनुष्य को बचा सकता है। उद्धारकर्ता का देहधारी परमेश्वर होना और सत्य व्यक्त करना ज़रूरी है। यही है सच्चा उद्धारकर्ता। कोई भी तथाकथित उद्धारकर्ता जो सत्य व्यक्त नहीं कर सकता, वह दुष्ट आत्मा है जो लोगों को धोखा दे रहा है। बहुत-से झूठे परमेश्वर हैं, जैसे कि सेलेब्रिटी, जिनकी चापलूसी की जाती है, जिनकी मौत के बाद उन्हें शहंशाह विधिवत परमेश्वर घोषित कर देते हैं। क्या वाकई इस बात में कोई दम है? ये लोग बस भ्रष्ट इंसान है, जो मरने के बाद नरक जाते हैं, तो वे किसे बचा सकेंगे? ये खुद को भी नहीं बचा सकते, और परमेश्वर उनके पापों के लिए उन्हें दंडित करता है। तो ये मनुष्य को कैसे बचा सकते हैं? ये तमाम शहंशाह बहुत पहले मर चुके हैं, और ये सब अब नरक में हैं। जिनको उन्होंने झूठा परमेश्वर बनाया, वे मनुष्य को नहीं बचा सकते। किसी भी कीमत पर, किसी झूठे परमेश्वर में विश्वास न रखें। यह बेवकूफी और अज्ञानता होगी, और यकीनन आपको तबाही तक ले जाएगी। याद रखिए कि उद्धारकर्ता को देहधारी परमेश्वर होना चाहिए, उसे सत्य व्यक्त करना चाहिए। ऐसा केवल परमेश्वर ही कर सकता है। कोई भी तथाकथित उद्धारकर्ता जो सत्य व्यक्त नहीं कर सकता, वह झूठा है और लोगों को गुमराह कर रहा है। जो देहधारी परमेश्वर न होकर भी परमेश्वर होने का दावा करता है, वह झूठा मसीह और एक दुष्ट आत्मा है। ऐसे लोग उद्धारकर्ता नहीं हैं, वे मनुष्य को नहीं बचा सकते। शैतान और सभी दुष्ट आत्मा परमेश्वर होने का नाटक करते हैं, लेकिन वे अभी भी सारी चीज़ों के सृजनकर्ता होने का दावा करने की हिम्मत नहीं कर सकते, खास तौर से यह दावा करने की कि उन्होंने इंसान को बनाया है। न ही यह दावा करने की हिम्मत करते हैं कि मनुष्य का भाग्य उनके हाथ में है। वे लोगों को गुमराह करने, उनकी वफादारी हासिल करने के लिए, यहाँ-वहाँ कुछ चिह्न और चमत्कार दिखा देते हैं। वे झूठे परमेश्वर और दुष्ट आत्मा, सभी लोगों को गुमराह कर भ्रष्ट करनेवाले दानव और राक्षस होते हैं। ये सृजनकर्ता, एकमात्र सच्चे परमेश्वर के दुश्मन होते हैं, ये मनुष्य को उससे छीनने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि ये दानव और दुष्ट आत्मा परमेश्वर के जानी दुश्मन हैं, वह उनसे घृणा कर उन्हें शापित करता है। तमाम लोग जो इन दानवों और दुष्ट आत्माओं का आदर और आराधना करते हैं, उन्हें परमेश्वर शापित और तबाह कर देगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "जब तक पुराने संसार का अस्तित्व बना रहता है, मैं अपना प्रचण्ड रोष इसके राष्ट्रों के ऊपर पूरी ज़ोर से बरसाऊंगा, समूचे ब्रह्माण्ड में खुलेआम अपनी प्रशासनिक आज्ञाएँ लागू करूँगा, और जो कोई उनका उल्लंघन करेगा, उनको ताड़ना दूँगा: जैसे ही मैं बोलने के लिए ब्रह्माण्ड की तरफ अपना चेहरा घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ सुनती है, और उसके उपरांत उन सभी कार्यों को देखती है जिन्हें मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध खड़े होते हैं, अर्थात् जो मनुष्य के कर्मों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन आएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और, मेरी बदौलत, सूर्य और चन्द्रमा नये हो जाएँगे—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था और पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। ब्रह्माण्ड के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से बाँटा जाएगा और उनका स्थान मेरा राज्य लेगा, जिससे पृथ्वी पर विद्यमान राष्ट्र हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राज्य बन जाएँगे जो मेरी आराधना करता है; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। ब्रह्माण्ड के भीतर मनुष्यों में से उन सभी का, जो शैतान से संबंध रखते हैं, सर्वनाश कर दिया जाएगा, और वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें मेरी जलती हुई आग के द्वारा धराशायी कर दिया जायेगा—अर्थात उनको छोड़कर जो अभी धारा के अन्तर्गत हैं, शेष सभी को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत-से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीते जाने के उपरांत, भिन्न-भिन्न अंशों में, मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार अलग-अलग किया जाएगा, और वे अपने-अपने कार्यों के अनुरूप ताड़नाएँ प्राप्त करेंगे। वे सब जो मेरे विरुद्ध खड़े हुए हैं, नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है, जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कर्मों में मुझे शामिल नहीं किया है, उन्होंने जिस तरह अपने आपको दोषमुक्त किया है, उसके कारण वे पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर अस्तित्व में बने रहेंगे। मैं अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, और अपनी वाणी से, पृथ्वी पर ज़ोर-ज़ोर से और ऊंचे तथा स्पष्ट स्वर में, अपने महा कार्य के पूरे होने की उद्घोषणा करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 26')।

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