ऑनलाइन बैठक

मेन्‍यू

अंतत: मुझे समझ आ गया कि किस प्रकार के लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं

संपादक की टिप्पणी

हर ईसाई स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाने की खूबसूरत आशा करता है। लेकिन किस तरह के लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? कुछ लोग सोचते हैं कि जब तक वे श्रम करते हैं, काम करते हैं, पीड़ा सहते हैं, स्वयं को खपाते हैं, और अपने अंत समय तक ऐसा करते रहते हैं, तो वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि जब हम प्रभु पर विश्वास करते हैं तो हमें हमारे पापों से छुटकारा दे दिया जाता है, और पाप के बिना, हमें केवल प्रभु के वापस आने का इंतजार करना होगा जब हम स्वर्गारोहित कर लिए जायेंगे किंतु क्या वास्तव में बात यही है? एक ईसाई व्यक्ति ऐक्सी ने इसका जवाब पा लिया है।

जब मैं 12 वर्ष का था, मैंने प्रभु यीशु पर विश्वास करना शुरू किया और ईसाई बन गया। विश्वास करने के बाद, मैं रविवार की आराधना और बाइबल अध्ययन समूहों में सक्रिय रूप से और दृढ़ता से भाग लिया करता था। बाइबल अध्ययन की बैठकों में, हम अक्सर 2 तीमुथियुस 4:7-8, "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धार्मिकता का वह मुकुट रखा हुआ है", पर चर्चा करते थे। हमें लगता था कि, ईसाई होने के नाते, हमें पौलुस का अनुकरण करना चाहिए और काम करने का प्रयास करते हुए भाग-दौड़ करनी चाहिए, क्योंकि प्रभु हमें धार्मिकता का ताज सौंपेंगे। हमारे पादरी भी अक्सर यह कहते हुए हमें प्रोत्साहित करते थे कि स्वर्ग के राज्य में प्रयासों के माध्यम से प्रवेश किया जाता है, और जब तक हम प्रभु के कार्य का अनुसरण करने के लिए प्रयास करते हैं, उसे परिश्रमपूर्वक करते हैं, तब तक प्रभु लौटने पर हमें स्वर्ग के राज्य में आरोहित कर लेंगे। ये शिक्षाएं परमेश्वर में मेरे विश्वास की आधारशिला बन गयीं, और मैंने मन में संकल्प लिया कि मैं अपनी पूरी शक्ति से कलीसिया सेवा कार्य में भाग लेने के लिए हरसंभव प्रयास करूँगा ताकि मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त "योग्यता" अर्जित कर सकूँ, ताकि जब वे आयें, तो मैं स्वर्ग के राज्य में आरोहित किया जा सकूँ।

विश्वविद्यालय में, मेरे पादरी ने कलीसिया में और अधिक प्रतिभा को बढ़ावा देने की बात की, ताकि कलीसिया का हर जगह विस्तार हो सके। जब मैंने देखा कि कलीसिया को अधिक लोगों की आवश्यकता है जो इसमें भाग लें और सेवा करें, तो मैंने सोचा, "अगर मैं प्रभु के लिए दृढ़तापूर्वक काम और श्रम करूँ, स्वयं को खपाऊँ, तो परमेश्वर निस्संदेह मुझे आशीष देंगे, और मैं स्वर्ग में अपने लिए पुरस्कार अर्जित कर सकता हूँ।" हालाँकि, उस अवधि के दौरान अपने पाठ्यक्रम के काम में बहुत व्यस्त था, लेकिन प्रत्येक सप्ताह, मैंने कक्षा के बाहर का अपना सारा समय सेवा कार्य करने, अध्ययन समूह की अगुआई करने, अपने भाई-बहनों से मेल-जोल और उनको सहारा देने में लगाया। यही नहीं कलीसिया की गतिविधियों की योजना बनाने, कलीसिया प्रशिक्षण में हिस्सा आदि में भी समय दिया। जब भी कलीसिया को मेरी सेवा की आवश्यकता होती थी, तो मैं निश्चित रूप से हाज़िर रहता था। भले ही मैं इतना व्यस्त था कि मुझे कलीसिया सेवा और अपनी कक्षाओं के बीच सांस लेने का भी समय नहीं मिलता था, लेकिन जब मैं सोचता था कि मेरे श्रम और कार्यों के बदले कैसे मुझे एक अच्छा भविष्य और प्रभु का आशीष मिलेगा, तो मुझे लगता था जैसे मेरे सभी बलिदान इसके लायक हैं।

लेकिन, धीरे-धीरे, मुझे पता चला कि कलीसिया के अगुआ अक्सर चढ़ावे को लेकर विवाद करते थे, वे हितों को लेकर गुटों में बंट हुए थे और कलीसिया के कार्यकर्ता आपस में पद को लेकर झगड़ते थे। मैं भी अक्सर पाप में जीता था, मैं उन भाई-बहनों के प्रति बहुत उत्साही था, जो मेरी देखभाल और मदद करते थे, लेकिन जब ऐसे भाई-बहनों को मेरी देखभाल और मदद की जरूरत होती थी जिनसे मैं परिचित नहीं था, तो मैं प्यार से उनकी सहायता करना नहीं चाहता था। मैंने एक अध्ययन समूह का नेता बनने के लिए जानबूझकर कुछ बातें कहीं और करीं, और इस तरह, अपने सहकर्मियों के खिलाफ प्रतिष्ठा और हित के लिए संघर्ष किया। इन सभी परिस्थितियों ने मुझे बहुत भ्रमित कर दिया। मेरे समेत कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता, प्रभु की सेवा में, शिकायत किये बिना श्रम कर सकते थे, साथ ही बहुत अधिक त्याग कर सकते थे, स्वयं को खपा सकते थे। ऐसा क्यों था कि प्रभु यीशु के हमें सहनशील, धैर्यवान और दूसरों से अपने समान प्रेम करना सिखाने के बावजूद भी हम ऐसा नहीं कर पाते थे?

संयोग से, विश्वविद्यालय की मेरी एक बहन ने मुझे और एक अन्य भाई को एक ऑनलाइन बाइबल अध्ययन समूह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। एक बैठक में, हमने धर्मशास्त्र के इन पदों की जाँच की, "जो मुझसे, 'हे प्रभु, हे प्रभु' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुत लोग मुझसे कहेंगे; 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हमने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैंने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करनेवालों, मेरे पास से चले जाओ'" (मत्ती 7:21-23)। मेरे भाई ने कहा, "पवित्रशास्त्र में उल्लिखित ये लोग, जो अधिकांश लोगों की धारणाओं के अनुसार प्रभु के नाम पर भविष्यवाणी और काम करते हैं वे, वे लोग हैं जो प्रभु के लिए सबसे अधिक स्वयं को खपाते हैं और बलिदान करते हैं। वे ऐसे लोग होने चाहिए, जिन्हें प्रभु सबसे अधिक पसंद करते हैं, और स्वर्ग के राज्य में जिनका स्थान निश्चित है। लेकिन प्रभु क्यों कहते हैं कि वह उन्हें स्वीकार नहीं करते हैं और इसके बजाय उनके पापों के लिए उनकी निंदा करते हैं?"

इन पदों को पढ़ने और अपने भाई के सवाल को सुनने के बाद, मैंने सोचा: हमने एक साल पहले अपने बाइबल अध्ययन समूह में इस बारे में बात की थी। उस समय, एक भाई ने यही सवाल पूछा था। प्रभु यीशु क्यों कहते हैं कि श्रम और काम करने वाले ये लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते? यह हमारे इस विश्वास के साथ टकराता हुआ क्यों प्रतीत होता है कि हम विश्वास करते हैं तो हम धार्मिक कहलायेंगे, और हम श्रम और कार्य के माध्यम से स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? भले ही हमने इन सवालों पर चर्चा की हो, लेकिन हमें इन रहस्यों का कोई समाधान नहीं मिला। बाद में, मैंने कलीसिया में अपने एक दोस्त से इसका जवाब माँगा। मिस्टर हुआंग, बाइबल से बहुत परिचित थे, लेकिन वे भी इसका कारण समझा पाने में नाकाम रहे, वे अपने विश्वास पर डटे रहे कि श्रम और काम हमें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की अनुमति देता है। उस दिन, इस भाई ने वही सवाल उठाया, जिससे मेरे मन में जिज्ञासा जगी। मेरा भाई कैसे संगति करेगा, मैं यह सुनना चाहता था।

मेरे भाई ने कहा, "कई लोग पौलुस के कथन, 'मैं मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धार्मिकता का वह मुकुट रखा हुआ है' (2 तीमुथियुस 4:7-8), को पढ़ते हैं और इसे अपना आदर्श वाक्य बना लेते हैं। वे श्रम, काम, पीड़ा और स्वयं को खपाने का प्रयास करते हैं, उनका मानना है कि अगर वे इन चीज़ों को करते रहते हैं, तो उन्हें प्रभु के द्वारा स्वर्ग के राज्य में आरोहित किया जाएगा। लेकिन, क्या यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? क्या प्रभु यीशु ने यह कहा था कि केवल श्रम और काम, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने और पुरस्कृत होने के लिए पर्याप्त हैं? स्वर्ग के राज्य में कौन प्रवेश करेगा इसका नियंत्रण परमेश्वर करते हैं, इसलिए किस प्रकार के लोग प्रवेश कर सकते हैं, इस समझ का आधार हमें प्रभु के वचनों को बनाना चाहिए न कि हमारी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को। प्रभु यीशु ने कहा है, 'जो मुझसे, 'हे प्रभु, हे प्रभु' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है' (मत्ती 7:21)। 'और तू प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना' (मरकुस 12:30)। प्रभु बहुत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि केवल वे ही जो पिता की इच्छा को पूरा करते हैं, वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं, वे लोग जो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करते हैं, वे हैं जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करते हैं, परमेश्वर को अपने पूरे दिल, आत्मा और मन से प्रेम करते हैं, और जो परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं। वह यह नहीं कहते हैं कि जो श्रम और काम करते हैं वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। व्यवस्था के युग में मुख्य याजकों, शास्त्रियों और फरीसियों ने मंदिर में नंगे पांव सेवा की, यहाँ तक कि पृथ्वी के सुदूर कोनों में जाकर सुसमाचार प्रचार भी किया। बाहर से, वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने, त्याग करने पीड़ा और शिकायत सहने वाले दिखाई पड़ते थे, लेकिन जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने के लिए आये तो, अपने पदों और आय को सुरक्षित रखने के लिए, उन्होंने हर तरह की अफवाहों को गढ़ा, जिसका जमकर विरोध किया और प्रभु यीशु की निंदा की। यहूदी धर्म के साधारण विश्वासियों को प्रभु यीशु की ओर मुड़ने से रोक दिया। वे परमेश्वर में विश्वास करते थे, लेकिन परमेश्वर को नहीं जानते थे, और परमेश्वर का विरोध करने और निंदा करने में भी सक्षम थे। इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने कितना काम किया, परमेश्वर कभी भी ऐसे लोगों को अपने राज्य में प्रवेश नहीं करने देंगे।"

"मुझे याद है कि हमारी कलीसिया में कैसे, बहुत से लोग प्रभु के कार्य के लिए सब कुछ त्यागने में सक्षम होने के बाद भी, हवा या बारिश की परवाह न करते हुए परमेश्वर की सेवा करने के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर देने के बावजूद, निर्विवादित रूप से अक्सर प्रभु के शिक्षाओं का पालन करने असमर्थ होते थे। हमारा काम और स्वयं को खपाना अक्सर हमारी खुद की महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को पूरा करता था, और यह पूरी तरह से परमेश्वर के प्रेम या उन्हें संतुष्ट करने की ख़ातिर नहीं किया जाता था। कभी-कभी, परमेश्वर की सेवा में, कुछ लोग हमारे भाई-बहनों द्वारा परमेश्वर को दिए गए चढ़ावों को चुरा लेते थे, उन्हें अपने भौतिक जीवन की पूर्ति के लिए रख लेते थे। अन्य लोग प्रभु से पुरस्कार पाने के बदले श्रम और काम करते थे न कि परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देने के लिए या परमेश्वर की ख़ातिर। कुछ लोग अक्सर अपने काम में और उपदेशों में प्रभु का गुणगान करने और उनकी गवाही देने के बजाय, स्वयं को ऊँचा उठाते और अपनी गवाही देते थे, ताकि विश्वासीगण उनकी आराधना करें और उन्हें सम्मान की नज़रों से देखें। उन लोगों के दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं थी, बल्कि अपना गुणगान गाने वालों के लिए जगह थी। कुछ लोगों ने जोश के साथ स्वयं को खपाया ताकि नेतृत्व की स्थिति हासिल कर सकें या विश्वासियों के बीच प्रतिष्ठा हासिल करने कर सकें। कुछ लोग, काम करते और मेहनत करते हुए भी, दौलत-शौहरत के लिए संघर्ष करते थे, अपने से अलग राय वाले लोगों को अलग-थलग करके, गुटों और समूहों का गठन करते थे, और अपने स्वयं के राज्यों को स्थापित करने का प्रयास करते थे...। क्या इस तरह के लोग संभवतः परमेश्वर की इच्छा पूरी कर सकते थे? क्या वे वास्तव में प्रभु को प्यार और संतुष्ट कर रहे थे? ऐसे लोग कभी भी परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर सकते, परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने की तो और भी संभावना नहीं है। हमने हमेशा सोचा था कि श्रम और कार्य, हमें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की अनुमति देंगे, लेकिन यह पूरी तरह से हमारी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित था।"

अपने भाई की संगति सुनने के बाद, कई दृश्य मेरे दिमाग में कौंध गए: कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता अपनी प्रतिष्ठा और अपने हितों के लिए लड़ते हुए, जरूरतमंद अपरिचित भाई-बहनों की मदद करने की मेरी अनिच्छा, अध्ययन समूह के नेता बनने के लिए जो कुछ मैंने कहा, किया और जो दिखावा किया और कैसे मैं अपने सहकर्मियों से अपनी प्रतिष्ठा और हितों के लिए लड़ा...। हम वास्तव में पाप में जी रहे हैं, हम वे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर की इच्छा पूरी करते हैं!

अगले दिन, मैं अपने भाई की संगति के बारे में सोचता ही जा रहा था। उनके शब्दों को बार-बार अपने दिमाग में दोहरा रहा था, यह सोच रहा था कि उनकी संगति वास्तव में प्रभु के वचनों के अनुसार थी। जब हमने श्रम किया, काम किया, और स्वयं को खपाया, तो हमने अपनी प्रतिष्ठा, हितों और पदों के लिए भी संघर्ष किया, लाभ के मामले में आपस में भिड़ गए, झूठ बोला, एक-दूसरे को धोखा दिया, अक्सर पाप किया और प्रभु का विरोध किया। हमारे कर्म पिता की इच्छा को पूरा करने वाले नहीं थे। प्रभु ने कहा है, "परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है।" जो लोग हमारी तरह बलिदान करते हैं और स्वयं को खपाते हैं वे आखिर किस तरह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? लेकिन दूसरी तरफ, भले ही हमारे काम और स्वयं को खपाने के पीछे के बहुत से इरादे गलत थे, और हम अभी भी पाप कर सकते हैं, प्रभु का विरोध कर सकते हैं, फिर भी हमारे पादरी ने अक्सर कहते थे कि प्रभु ने हमारे पापों को माफ कर दिया है, और जब वह आयेंगे, तो हमें सीधे स्वर्ग के राज्य में आरोहित कर लिया जायेगा। यहाँ पर मामला क्या है? मैं बहुत उलझन में था। मुझे अगली बैठक का इंतजार था, जब मैं अपने भाई के साथ इन सवालों पर पूरी तरह से चर्चा कर सकता था।

यदि आप स्‍वर्ग के राज्‍य के भेद के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो हमारे “स्वर्ग के राज्य का रहस्य” पृष्ठ पर या नीचे दी गई सामग्री का अवलोकन करें।

अगली बार जब मैं संगति के लिए ऑनलाइन गया, तो मैंने अपने भाई से पूछा, "यह सच है कि हम श्रम, काम करते हुए, उत्साहपूर्वक स्वयं को खपाते हुए, मन में कई गलत इरादे रखते हैं, जिससे कि हम अक्सर पाप और परमेश्वर का विरोध करते हैं, और हम पिता की इच्छापूर्ति नहीं कर रहे हैं। प्रभु यीशु ने कहा है, 'परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है,' इसलिए इस तर्क से, हम अभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के अयोग्य हैं। लेकिन यह सवाल अभी भी मुझे भ्रमित कर रहा है, क्योंकि हमारे पादरी अक्सर कहते हैं कि प्रभु यीशु ने हमारे सभी पापों को पहले ही माफ कर दिया है, इस कारण हम पापी नहीं हैं, विश्वास करने की वजह से हम धार्मिक कहलाते हैं, और जब प्रभु आयेंगे, तो हम सीधे स्वर्ग में आरोहित किये जाएंगे। वह ऐसा क्यों कहते हैं? मैं इस पर आपकी संगति सुनना चाहूँगा।"

मेरे भाई ने कहा, "प्रभु यीशु को मानवजाति के पापों के छुटकारे के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया था, और जब हम प्रभु से प्रार्थना करते हैं, अपने पापों को प्रभु के समाने स्वीकार करते हैं, पश्चाताप करते हैं, तो हमारे पापों को क्षमा कर दिया जाता है, लेकिन क्या हमारे पापों को माफ कर दिये जाने का मतलब है कि हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? आइए इस अंश को पढ़ें, 'तुम्हारे लिए, तुम जो कि अभी भी पुराने अहम् वाले हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और कि परमेश्वर द्वारा उद्धार की वजह से तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुम्हें बदला नहीं गया तो तुम संत जैसे कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता से घिरे हुए हो, स्वार्थी और कुटिल हो, मगर तब भी तुम यीशु के साथ अवतरण चाहते हो—क्या तुम इतने भाग्यशाली हो सकते हो? तुम परमेश्वर पर अपने विश्वास में एक कदम चूक गए हो: तुम्हें मात्र छुटकारा दिया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें परिवर्तित और शुद्ध करने का कार्य करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुटकारा दिया जाता है, तो तुम पवित्रता को प्राप्त करने में असमर्थ होंगे। इस तरह से तुम परमेश्वर के आशीषों में साझेदारी के अयोग्य होंगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य के एक कदम का सुअवसर खो दिया है, जो कि परिवर्तित करने और सिद्ध बनाने का मुख्य कदम है। और इसलिए तुम, एक पापी जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हो'" ('पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में')।

उन्होंने संगति की, "परमेश्वर के वचनों से, हम सीखते हैं कि यह तथ्य कि प्रभु यीशु ने हमारे पापों को क्षमा कर दिया है और हम पापी नहीं है, केवल व्यवस्था के तहत हमारे दोषी न ठहराये जाने को संदर्भित करता है। जब हम प्रभु यीशु के बचाने वाले अनुग्रह को स्वीकार करते हैं, तो हम प्रभु के सामने आने, उनसे प्रार्थना करने, अपने पापों को स्वीकार करने, पश्चाताप करने और परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने के योग्य हो जाते हैं। लेकिन यह निर्विवादित है कि हमारे शैतानी स्वभाव हमारे भीतर गहराई से जड़े जमाये हुए हैं, अहंकार, स्वार्थ, और छल जैसे भ्रष्ट आचरण अभी भी हमारे भीतर मौजूद हैं। अगर हम परमेश्वर का विरोध करने वाली इन शैतानी प्रकृतियों और भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं करते हैं, तो हम अब भी अनजाने में पाप कर सकते हैं और परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं, जिसका अर्थ है कि हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते। यह वैसा ही है जैसा बाइबल कहती है, 'क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है' (रोमियों 6:23)। 'यीशु ने उनको उत्तर दिया, 'मैं तुम से सच-सच कहता हूँ कि जो कोई पाप करता है, वह पाप का दास है। और दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है' (यूहन्ना 8:34-35)। 'पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ' (1 पतरस 1:16)। हम गंदगी से भरे हुए हैं, हम अभी भी पाप कर सकते हैं, और जब तक हम शुद्ध नहीं हो जाते, हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते हैं, जो परमेश्वर के पवित्र सार और धर्मी स्वभाव से तय होता है। इसलिए, परमेश्वर के मुख को देखने के योग्य होने से पहले, हमें परमेश्वर के उद्धार के चरणों का अनुभव करने, अपनी पापी प्रकृतियों से बचने, और पूरी तरह से शुद्ध किये जाने की ज़रूरत है। इन बाइबल पदों का यही मतलब है, 'जिनकी रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से, विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाली है, की जाती है' (1 पतरस 1:5)। 'क्योंकि वह समय आ पहुँचा है, कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए' (1 पतरस 4:17)। यह परमेश्वर के घर से शुरू होने के अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य का बचाने वाला अनुग्रह है। जब हम अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करते हैं, अपने भ्रष्ट स्वभावों में परिवर्तन प्राप्त करते हैं, पाप के बंधन और बाधाओं को और नहीं झेलते हैं, ऐसे लोग बन जाते हैं जो वास्तव में परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं, तभी हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य होंगे।"

जब मैंने अपने भाई की संगति सुनी, तो मेरे दिल में बहुत उजाला महसूस होने लगा। हमारे पास प्रभु यीशु का छुटकारा है, हम पापी नहीं हैं, और प्रभु के लिए बहुत काम कर सकते हैं और पीड़ा सह सकते हैं, लेकिन हमें शुद्ध नहीं किया गया है, और हम अभी भी प्रभु की शिक्षाओं का पालन नहीं कर पाते हैं। कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता अभी भी पद के लिए संघर्ष कर सकते हैं, वे अक्सर पाप करते हैं और प्रभु को अपमानित करते हैं, जिसका अर्थ है कि वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं। पहले, मैं सोचता था कि हमें हमारे पापों से छुटकारा दे दिया गया है, और यह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए पर्याप्त है, लेकिन अब मैं समझ गया हूँ कि यह पूरी तरह से मेरी अपनी धारणाओं और कल्पना पर आधारित है। प्रभु यीशु ने हमें छुड़ाया है, वे अब हमें पापी के रूप में नहीं देखते हैं, लेकिन भ्रष्ट स्वभाव जो हमारे पाप करने का कारण हैं, वे अभी भी अस्तित्व में हैं। स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने और अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए, हमें अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य से गुजरना और अपने पाप और पश्चाताप करने के मूल कारण का पूरी तरह से समाधान करना ही होगा। मैंने तब अपने भाई से तत्काल पूछा, "परमेश्वर अंत के दिनों में न्याय का कार्य कैसे करते हैं?"

भाई ने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, "अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।"

उसने संगति की, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट रूप से बताते हैं कि अंत के दिनों में परमेश्वर कैसे न्याय का कार्य करते हैं। परमेश्वर न्याय के कार्य को करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करते हैं, परमेश्वर संपूर्ण सत्य को व्यक्त करते हैं जो मानवजाति को शुद्ध कर सकता और बचा सकता है, साथ ही साथ अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट करते हैं, जो कोई अपराध सहन नहीं करता है, वे हमें सच्चा तथ्य बताते हैं कि शैतान द्वारा हम कैसे भ्रष्ट किये गये हैं, परमेश्वर के प्रति हमारे विद्रोह और प्रतिरोध की जड़ क्या है, और वह किस तरह के लोगों को बचायेंगे और किसे वह दंडित और समाप्त करेंगे। साथ ही, वह उस मार्ग को इंगित करते हैं जिसके द्वारा हम उद्धार प्राप्त कर सकते हैं और शुद्ध किये जा सकते हैं। केवल जब हम न्याय और ताड़ना के परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करते हैं, तभी हम शैतान द्वारा हमारे भ्रष्टाचार के वास्तविक तथ्य को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, अपनी अभिमानी प्रकृतियों के नियंत्रण में, जब हम किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं, जिसकी राय हमसे मेल नहीं खाती है, तो हम उन पर हमला कर सकते हैं और उन्हें अलग-थलग कर सकते हैं। जब हम कलीसिया का काम करते हैं तो हम अक्सर दिखावा करते हैं, दूसरों से ऊपर उठने और दूसरों के दिल में जगह बनाने की कोशिश करते हैं। लोगों के साथ हमारी बातचीत में, हम हमेशा अपने हितों पर विचार करते हैं, और हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए दूसरों को धोखा देते हैं और उनका उपयोग करते हैं। हम परमेश्वर के साथ सौदेबाज़ी करने के प्रयास में, स्वर्ग के राज्य में आशीष के लिए श्रम और काम करते हैं, कष्ट सहते है, स्वयं को खपाते हैं। हम ऐसे कई काम करते हैं। जब हम वास्तव में स्पष्ट रूप से देखते हैं कि जो हम जी रहे हैं वह केवल शैतानी समानता है, तो हमारे भीतर सच्चा पश्चाताप उत्पन्न होता है, और हम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को और अधिक स्वीकार करने और सत्य का अनुसरण करने की इच्छा रखते हैं। धीरे-धीरे, इन कृत्यों के माध्यम से, हम अपने भ्रष्ट स्वभावों के बाधाओं और बंधन से बच निकलते हैं और शुद्ध हो जाते हैं। केवल तभी हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के योग्य हैं।"

अपने भाई की संगति सुनने के बाद, मैं अंत में समझ गया कि हम पाप के बंधन से नहीं बच सकते क्योंकि हमने अंत के दिनों के परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव नहीं किया है। हमें शैतान द्वारा हमारे भ्रष्टाचार की सच्चाई की, या परमेश्वर के कोई अपराध न सहने वाले धर्मी स्वभाव की कोई समझ नहीं है, इसलिए हम अभी भी अनजाने में पाप कर सकते हैं। श्रम, कार्य, बाइबल पढ़ने या प्रार्थना करने की कोई मात्रा उस समस्या को हल नहीं कर सकती है, इसके लिए अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकारने की आवश्यकता होती है। परमेश्वर के मानवजाति की भ्रष्ट प्रकृतियों को न्याय और ताड़ना देने वाले परमेश्वर के वचन सुनने, शैतान द्वारा हमारे भ्रष्टाचार के तथ्य को सच में समझने, और वास्तव में अपने स्वयं की प्रकृति और सार को समझने के माध्यम से, हम शैतान से नफ़रत और उसका विरोध कर सकते हैं और परमेश्वर की ओर मुड़कर उनका आज्ञापालन कर सकते हैं। जब हम ऐसा करते हैं, तो हम वास्तव में पाप के बंधन से बच जाते हैं और शुद्ध किये जाते हैं। मुझे लगा कि आखिरकार स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए मेरे पास एक रास्ता है!

उसके बाद, मेरे भाई ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप भेजा। बैठक के बाद, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की आधिकारिक वेबसाइट पर जाने के लिए बेचैन हो उठा। जब मैंने इसे देखा, तो मैं बिल्कुल हैरत में पड़ गया। मैंने कभी नहीं सोचा था कि परमेश्वर ने पहले से ही इतने नए वचन किए हैं, वचन जो परमेश्वर के कार्य के रहस्य को प्रकट करते हैं, ऐसे वचन जो भ्रष्ट मानवजाति की शैतानी प्रकृति और सार को उजागर करते हैं, ऐसे वचन जो परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप को व्यक्त करते हैं, वचन जो सत्य के ऐसे पहलू को व्यक्त करते हैं जिसमें मानवजाति को प्रवेश का अभ्यास करना चाहिए...। जैसे ही मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, मेरा दिल सच में प्रेरित हो गया। मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया द्वारा निर्मित सुसमाचार फिल्में और नृत्य प्रदर्शन वीडियो भी देखा और गवाही के सभी प्रकार के लेख पढ़े। मैंने महसूस किया कि मैं वास्तव में मेम्ने के विवाह भोज में था, और मेरी आध्यात्मिक भूख ऐसे तृप्त हो गयी पहले कभी नहीं हुई थी।

मैं छह महीनों से सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करता रहा हूँ जो पलक झपकते बीत गये हैं, कलीसिया में मैंने यथासंभव कर्तव्य निभाए हैं। अपने अनुभव के माध्यम से, मैंने परमेश्वर के कार्य का थोड़ा ज्ञान प्राप्त किया है। न्याय के परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन में, मुझे अपने गलत प्रयासों और विचारों को समझ पाने के साथ-साथ अहंकार और स्वार्थ के मेरे शैतानी भ्रष्ट स्वभावों के बारे में पता चला है, मैंने सीखा है कि एक ईमानदार व्यक्ति होना एक सच्ची मानवीय समानता को जीने का तरीका है। हर बार जब मैं नकारात्मक और कमजोर महसूस करता हूँ, तो परमेश्वर के वचन मुझे आपूर्ति और सहारा देते हैं, और मुझे परमेश्वर की दया और सच्चा प्यार महसूस करने देते हैं। जब मैं परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह या विरोध करता हूँ, तो परमेश्वर के गंभीर वचन मेरे पास आते हैं, और मुझे अपने भ्रष्टाचार की सच्चाई दिखाई देती है। मैंने वास्तव में महसूस किया है कि अंत के दिनों में मानवजाति का न्याय करने और उसे शुद्ध करने का परमेश्वर का कार्य, लोगों के लिए पाप के बंधन से पूरी तरह से बचने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। सारी महिमा सर्वशक्तिमान परमेश्वर की हो।

यदि आप स्‍वर्ग के राज्‍य के भेद के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो हमारे “स्वर्ग के राज्य का रहस्य” पृष्ठ पर या नीचे दी गई सामग्री का अवलोकन करें।

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