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सच्चा ईसाई धर्म क्या है?

आजकल बहुत सारी कलीसिया हैं, इसलिए ईसाई धर्म की सच्ची कलीसिया कौन-सी है? यह बहुत-से ईसाइयों लिए यह व्याकुलता का विषय है। आइए आज इस प्रश्न के बारे में संगति करें।

सच्चा ईसाई धर्म कैसे बनता है?

यह समझने के लिए कि सच्चा ईसाई धर्म कैसे गठित होता है, हमें पहले ईसाई धर्म की उत्पत्ति को जानना आवश्यक है। ईसाई धर्म की उत्पत्ति का प्रभु यीशु के कार्य से गहरा संबंध है। दो हज़ार साल पहले, मनुष्य-जाति की आवश्यकताओं के लिये, परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के पुत्र के रूप में देह धारण किया और अपना नाम यीशु रखा, अनुग्रह के युग की शुरुआत की और मानव-जाति के लिये स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का प्रचार किया। प्रभु यीशु के पुनर्जीवित होने और स्वर्ग लौटने के बाद, उसके अनुयायी शिष्यों ने व्यापक रूप से सुसमाचार का प्रचार करना आरम्भ किया। परिणामस्वरूप, अधिक से अधिक लोगों ने प्रभु यीशु का अनुसरण किया, और कलीसियाओं की संख्या बढ़ने लगी। प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था, मसीह था, इसलिए जो कलीसियाएँ प्रभु यीशु में विश्वास रखती थीं, वे ईसाई धर्म कहलायीं। कहने का तात्पर्य यह है कि ईसाई धर्म के मूल में देहधारी परमेश्वर का प्रकटन और कार्य है और यह उन लोगों से बना है जो मसीह में विश्वास रखते हैं। यही ईसाई धर्म की उत्पत्ति है।

सच्चा ईसाई धर्म क्या है

सच्चा ईसाई धर्म मसीह की पवित्र आत्मा द्वारा शासित है; सच्चाई में शक्ति होती है। मसीह के सभी अनुयायी मसीह को ऊंचा उठाते हैं, वे किसी व्यक्ति की पूजा या अनुसरण नहीं करते हैं। वे परमेश्वर के नए वचनों को पढ़ते हैं, परमेश्वर के नए कार्यों का अनुभव करते हैं, वे परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। इस तरह की कलीसिया में पवित्र आत्मा का कार्य होता है और वास्तव में यही ईसाई धर्म कलीसिया है। उदाहरण के लिए, अनुग्रह के युग में, जब प्रभु यीशु ने पुराने युग का समापन किया और नया कार्य आरम्भ किया, तो पतरस, नतनएल, यूहन्ना और अन्य सभी शिष्यों ने परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण किया और परमेश्वर का सिंचन, परमेश्वर का पोषण और और पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त किया। परमेश्वर ने चरवाहे के रूप में उनका नेतृत्व किया था, और ये वे लोग थे जो एक सच्ची कलीसिया की सभाओं में सम्मिलित हुए थे। जबकि फरीसियों ने बाइबिल के पुराने वचनों पर चलते हुए परमेश्वर के नये नक्शेकदम पर चलने और बढ़ने से इनकार कर दिया। वे पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति उदासीन थे, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के नए कार्य का विरोध भी किया। उनकी सभाओं को केवल धार्मिक समूह ही कहा जा सकता है, न कि ईसाई धर्म जो कि मसीह का अनुसरण करता था।

अब हम समझ गए हैं कि ईसाई धर्म क्या है। शायद कुछ लोग आश्चर्य कर रहे होंगे कि क्या सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया ईसाई धर्म का ही एक हिस्सा है क्योंकि यह अधिक से अधिक समृद्ध होता जा रहा है और हर संप्रदाय के बहुत से लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर मुड़ गए हैं।

क्या सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया ईसाई धर्म का एक अँश है?

इसको समझने के लिये आइए, पहले हम यह सुनिश्चित करें कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु का ही पुनरागमन हैं? दो हज़ार वर्ष पहले प्रभु यीशु ने यह वादा किया था कि वह फिर वापस आएँगे। अब अँत के दिन हैं, आपदाएँ अक्सर आने लगी हैं और दुनिया में विक्षोभ की स्थिति है। प्रभु यीशु के वापसी की मूल भविष्यवाणी परिपूर्ण हो गई है। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि प्रभु यीशु पहले ही आ चुके हैं। प्रभु यीशु के भविष्यवाणी की थी कि, "क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्चिम तक चमकती जाती है, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा" (मत्ती 24:27)। "तुम भी तैयार रहो; क्योंकि जिस घड़ी तुम सोचते भी नहीं, उस घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा" (लूका 12:40)। "देख, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ; और हर एक के काम के अनुसार बदला देने के लिये प्रतिफल मेरे पास है। मैं अल्फा और ओमेगा, पहला और अन्तिम, आदि और अन्त हूँ" (प्रकाशितवाक्य 22:12-13)। उन्होंने ऐसा भी कहा था, "और मेरी और भी भेड़ें हैं, जो इस भेड़शाला की नहीं; मुझे उनका भी लाना अवश्य है, वे मेरा शब्द सुनेंगी; तब एक ही झुण्ड और एक ही चरवाहा होगा" (यूहन्ना 10:16)। "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। उन्होंने ऐसा भी कहा था, "मनुष्य का पुत्र आ जाएगा" और "वैसा ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा" प्रभु यीशु द्वारा बोले गये सभी वचन अंतिम दिनों में परमेश्वर के पुन: देहधारी होने की ओर इंगित कर रहे हैं। केवल देहधारी परमेश्वर को ही मनुष्य का पुत्र कहा जा सकता है। स्पष्ट रूप से, प्रभु यीशु अंतिम दिनों में देह में लौट आएंगे और मसीह के रूप में अपनी पहचान के माध्यम से मानव जाति को दिखाई देंगे। इस के अतिरिक्त, वह वापस आने पर नए वचन बोलेंंगे और नये काम करेंंगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उपस्थिति और कार्य ने प्रभु यीशु की भविष्यवाणियों को पूरा किया है। प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य की नींव पर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, परमेश्वर के परिवार में शुरू होने वाले न्याय का कार्य करते हैंं और उस संपूर्ण सत्य को व्यक्त करते हैंं, जो मनुष्य को शुद्ध करने और मुक्ति प्राप्त करने में सक्षम करेगा। उन्होंने उन सच्चाइयों का खुलासा किया है जो परमेश्वर के स्वयं के प्रबंधन कार्य के बारे में हैं, जैसे कि परमेश्वर के तीन चरणों के उद्देश्य और महत्व, परमेश्वर के देहधारी होने का रहस्य, अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय कार्य और मानव जाति का अंतिम गंतव्य. उनके वचनों से सभी मानव जाति के उस भ्रष्ट सार और भ्रष्टाचार के स्रोत का पता चलता है, जिसे मानव जाति खुद भी महसूस नहीं कर सकती है कि उस भ्रष्टता का स्वभाव उनके दिलोदिमाग में है। मनुष्य इन वचनों को पढ़ते ही दिल से आश्वस्त हो जाता है। वहीं पर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन मनुष्य को शैतान के द्वारा दिखाए गए अंधकार के प्रभावों को दूर करने, शुद्ध होने और मुक्ति पाने का मार्ग दिखाते हैं. वे मनुष्य को उन सभी सच्चाइयों के बारे में बताते हैं जिसका मनव जाति को अभ्यास करना चाहिए और परमेश्वर में अपने विश्वास को दृढ़ करना चाहिए, जैसे कि कैसे एक ईमानदार व्यक्ति बनें, परमेश्वर से प्रेम और सत्य का पालन कैसे करें, परमेश्वर का भय कैसे मानें और बुराई से कैसे दूर रहें, परमेश्वर की सेवा कैसे करें व एक सामान्य मानवता में कैसे रहें, इत्यादि। ये सभी वे सत्य हैं जो हम अनुग्रह के युग में सहन नहीं कर सकते क्योंकि हम उस समय तुच्छ थे, जैसा कि परमेश्वर ने उल्लेख किया है। अंतिम दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें ये सभी सत्य बताए हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों की जांच करने के बाद, दुनिया के विभिन्न संप्रदायों के कई लोग निश्चित हो गए हैं कि वो ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु हैंं। उन सभी ने तब से अपने पहले के चर्चों को छोड़, परमेश्वर के नए कार्य का अनुसरण किया है। वे अपनी आत्माओं में खुद को अपरिपूर्णता से छुटकारा दिलाते हैं, पवित्र आत्मा का कार्य हासिल करते हैं, जीवन के जल की आपूर्ति और जीवन की परिपूर्णता प्राप्त करते हैं। यह सिद्ध करता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही अंतिम दिनों में देहधारी हुए मसीह अर्थात प्रभु यीशु हैंं, क्योंकि केवल मसीह ही मनुष्य को सत्य, मार्ग और जीवन दे सकते हैंं। मसीह पर विश्वास करने वाले वे सभी ईसाई धर्म से संबंधित हैं। प्रभु यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर, परमेश्वर के दो अवतारों के नाम हैं, वे एक परमेश्वर हैं, और इसलिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर का चर्च स्वाभाविक रूप से ईसाई धर्म के अंतर्गत ही आता है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वरऔर ईसाई धर्म के चर्च एक ही परमेश्वर, एक सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जिन्होंने स्वर्ग और पृथ्वी पर सभी चीजों का निर्माण किया। उनके बीच अंतर यह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर और ईसाई धर्म के चर्च ऐसे चर्च हैं जो विभिन्न युगों में परमेश्वर के कार्य से स्थापित किये गये हैं। ईसाई धर्म अनुग्रह के युग का ईसाई चर्च है, और वे प्रभु यीशु, जो कि पहले मसीह थे, में विश्वास करते हैं। वे अनुग्रह के युग में परमेश्वर के छुटकारे के कार्य को पकड़े हुए हैं और वे केवल वही अभ्यास करते हैं जो प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में मनुष्य के लिए आवश्यक बताया था; सर्वशक्तिमान परमेश्वर का चर्च राज्य के युग का ईसाई चर्च है, जिसके प्रवर्तक अंतिम दिनों में लौते हुए सर्वशक्तिमान परमेश्वर (देह में वापस लौटे हुए प्रभु यीशु) के न्याय के कार्य को स्वीकार करते हैं और वे परमेश्वर की राज्य के युग के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नए नाम से प्रार्थना करते हैं, वे अंतिम दिनों के मसीह द्वारा दिए गए जल और आपूर्ति को स्वीकारते हैं, और वे अंतिम दिनों के परमेश्वर के नए कथन को पढ़ते हैं। इसलिए, अंतिम दिनों में जो लोग प्रभु यीशु पर विश्वास करते हैं, वे एक उपनिवेश युग के ईसाई धर्म को धारण कर रहे हैं। केवल अंतिम दिनों के मसीह में विश्वास करने वाला सर्वशक्तिमान ईश्वर का चर्च, अधिक यथार्थवादी ईसाई धर्म है जो मेम्ने के नक्शेकदम पर चलता है।

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